खेल के मैदान की परेशानी फुटबॉल जैसी गोल थी।
गेंद कभी झूलों के नीचे पहुँचती, कभी कूदने वाली रस्सियों में फँसती और एक दिन सीधे मीरा के खुले लंचबॉक्स में जा गिरी।
मीरा ने अपना सैंडविच उठाया। “इसके घास वाले बाल उग आए हैं।”
सारा ने बैंगनी नोटबुक निकाली। उसे नक्शे पसंद थे। नक्शे पर हर चीज़ अपनी जगह रहती थी—कम से कम पेंसिल से बनाई हुई चीज़ें।
उसने मैदान को साफ़ हिस्सों में बाँट दिया: फुटबॉल, रस्सी-कूद, चौखाने, झूले, फिसलपट्टी और सुरक्षित नाश्ता।
कबीर ने नक्शा देखा। “फुटबॉल की जगह डाक टिकट जितनी क्यों है?”
“क्योंकि गेंद बहुत जगह खा रही थी।”
सारा की योजना चार मिनट चली।
आरव ने पहली किक मारी और खुद ही रेखा के बाहर पहुँच गया। एक रस्सी चौखानों में जा घुसी। छोटे बच्चों ने फिसलपट्टी पर चॉक से ड्रैगन बनाकर घोषणा कर दी, “यह बिना नक्शे वाला राज्य है!”
नाश्ते की जगह पेड़ के नीचे थी। ऊपर बैठी चिड़िया ने मीरा को वहाँ से भागने पर मजबूर कर दिया।
“सैंडविच बचाओ!” कबीर चिल्लाया।
सारा ने नक्शे पर इतनी ज़ोर से काटा कि पेंसिल की नोक टूट गई।
माया उसके पास बैठी। “इस नक्शे में सिर्फ तुम्हारी बात है। बाकी बच्चों की कहाँ है?”
सारा मैदान देखने लगी। आरव गेंद रोकने की कोशिश में हाँफ रहा था। रस्सी-कूद वाली नैना अपने टखने सहला रही थी। छोटे बच्चे फिसलपट्टी के आगे पहरा दे रहे थे। मीरा अपना सैंडविच लेकर छत ढूँढ़ रही थी। हर किसी की परेशानी अलग थी।
अगले दिन सारा ने बड़ा खाली कागज़ दीवार पर चिपकाया। ऊपर लिखा: मैदान की बैठक—मधुमक्खी पीछे पड़े तभी चिल्लाएँ।
इस बार सबने अपनी जगह खुद बताई। आरव ने गेंद दौड़ाकर दिखाई। नैना ने रस्सियों के लिए लंबी पट्टी बनाई। छोटे बच्चों ने फिसलपट्टी के चारों ओर ड्रैगन की सीमा खींची। मीरा को बरामदे के नीचे नाश्ते की जगह मिली।
शुक्रवार को खेल शुरू हुआ। गेंद ज़्यादातर अपनी सीमा में रही, रस्सियाँ आराम से घूमीं और मीरा के सैंडविच पर एक भी घास का बाल नहीं था।
कबीर नाटकीय चाल से चौखानों में घुसा। तीन बच्चों ने उसे वापस भेज दिया।
“योजना काम कर रही है,” उसने कहा। “इसने मुझे बाहर निकाल दिया।”
सारा ने लिखा: नक्शा बनाने से पहले ड्रैगन वाले बच्चों से बात करना ज़रूरी है।
