दूसरी घंटी बजने से पहले ही सारा समझ गई—कुछ गड़बड़ है।
लीना का लंचबॉक्स फिर गायब था।
सोमवार को वह रंगों की बोतलों के बीच मिला था। मंगलवार को खोई चीज़ों की टोकरी में, कबीर की टोपी पहने। और आज नीली शेल्फ़ फिर खाली थी।
सारा ने अपनी बैंगनी नोटबुक खोली और लिखा: केस 14—अपनी जगह से भागने वाला लंचबॉक्स। नीचे उसने डिब्बे को शक वाली मूँछें भी बना दीं।
कबीर ने अपना बैग खोला। पके केले की तेज़ गंध निकली।
“पहला शक तुम्हारे केले पर,” सारा बोली।
“सही है,” कबीर ने कहा। “मैं भी इससे दूर रहना चाहता हूँ।”
बच्चों ने तरह-तरह के अंदाज़े लगाए। किसी ने कहा डिब्बा लाइब्रेरी में पढ़ने गया है। किसी ने कहा वह छुट्टी पर है। आरव बोला, “शायद लीना फिर घर भूल आई।” कुछ बच्चे हँस पड़े।
लीना भी हँसी, पर उसकी हँसी तुरंत बुझ गई। सारा ने वह छोटा-सा सुराग देख लिया।
लंच के समय डिब्बा चार्ट पेपर के पीछे मिला। उस पर पर्ची चिपकी थी—अचार वाली राजकुमारी।
लीना ने पर्ची मुट्ठी में दबा ली। “कुछ नहीं।”
अगले दिन सारा और कबीर एक बड़ी मौसम वाली किताब के पीछे छिप गए।
कबीर फुसफुसाया, “आज मीटबॉल बरसने की तीस प्रतिशत उम्मीद है।”
“चुप, सहायक केला।”
तभी आरव ने लीना का डिब्बा उठाकर ग्लोब के पीछे सरका दिया। सारा के होंठों तक “पकड़ा!” पहुँच चुका था। फिर उसने लीना को देखा। वह जूते का ठीक बँधा फीता खोलकर दोबारा बाँध रही थी, ताकि किसी की नज़र उससे न मिले।
सारा चुप रही।
छुट्टी में वह आरव के पास बैठी। “तुम डिब्बा क्यों छिपाते हो?”
आरव ने कंकड़ ठेला। “सबको वह नाम मज़ेदार लगा था।”
“लीना को नहीं।”
“वह कुछ बोलती ही नहीं।”
सारा ने जूते बाँधती लीना को याद किया। “शायद सबके हँसते समय बोलना मुश्किल होता है।”
आरव कुछ देर चुप रहा। फिर लीना के पास जाकर बोला, “मैंने तुम्हारा डिब्बा छिपाया था। सॉरी। अब नहीं करूँगा।”
लीना ने कहा, “मेरे खाने को अजीब नाम मत देना।”
“ठीक है।”
अगले दिन लंचबॉक्स अपनी शेल्फ़ पर रहा। उसके पास कबीर की पर्ची लगी थी—लंचबॉक्स पार्किंग। केले तीन नोटबुक दूर रखें।
इस बार लीना खुलकर हँसी।
सारा ने लिखा: केस बंद। डिब्बा सुरक्षित। केला अब भी संदिग्ध।
