बंदरू बंदर पंचवन की हर आवाज निकाल सकता था। वह मैना की तरह चहकता, मेंढक की तरह टर्राता और एक बार गजराज की आवाज ऐसी निकाली कि तीन हाथियों ने आम के पेड़ को सलाम कर दिया।
उसकी पसंदीदा शरारत थी डरकर चिल्लाना।
“बाघ! बाघ!”
पहली बार हिरन भागे, खरगोश बिलों में घुसे और गजराज काँटेदार झाड़ी पार कर गए। बंदरू डाल से उलटा लटककर हँसता रहा।
दो दिन बाद उसने फिर यही किया। इस बार शेरू सियार का खाना नदी में गिर गया।
चिंटू ने कहा, “किसी दिन सच में बाघ आएगा और जवाब में केवल तुम्हारी गूँज मिलेगी।”
बंदरू ने शरारत छोड़ने का वादा किया। दोपहर तक वह बाघ जैसी गुर्राहट सीख रहा था।
एक हफ्ते बाद पुराने कुएँ के आगे बिना हवा के डाल हिली। नीचे धारीदार बाघ मैदान की ओर दबे पंजे बढ़ा रहा था। वहाँ हिरन के बच्चे खेल रहे थे।
बंदरू की हँसी गायब हो गई।
“बाघ!” वह चिल्लाया। “इस बार सच में!”
कोई नहीं भागा। शेरू ने कान ढक लिए। हिरन घास खाते रहे।
बंदरू बाघ के ऊपर-ऊपर दौड़ा। उसने टहनियाँ तोड़ीं और कच्चे फल फेंके। बाघ ने गुस्से से ऊपर देखा, मगर मैदान की ओर बढ़ता रहा।
तभी बंदरू को काँटेदार रास्ते के ऊपर लाल मधुमक्खियों का छत्ता दिखा। वह नीचे झूला और पूँछ से बाघ की नाक छू दी।
बाघ दहाड़कर उसके पीछे दौड़ा।
बंदरू रास्ता पार कर गया। बाघ छत्ते के नीचे पहुँचा तो बंदरू ने डाल पर लात मारी।
छत्ता नीचे गिरा।
सैकड़ों गुस्साई मधुमक्खियाँ बाघ के कानों पर टूट पड़ीं। वह घूमता, छींकता हुआ काँटों में भागा। पूरा झुंड पीछे था।
अब जंगल ने असली दहाड़ सुनी। गजराज हाथियों को मैदान में लाए। चित्रा ने बच्चों को घेरा। शेरू को मिट्टी में बड़े पंजों के निशान मिले।
“इस बार तुम सच बोल रहे थे,” उसने कहा।
बंदरू ने कमर पर लगी तीन डंक खुजलाईं। “भरोसा जगाने के लिए बुरा दिन चुना।”
हाथियों ने बाघ को पत्थरीली उत्तरी पहाड़ी के पार तक खदेड़ दिया। कई शाम तक जंगल के किनारे पहरा लगा। बंदरू हर पहरे में आया। वह मेंढक और मैना की आवाज अब भी निकालता, पर खतरे की पुकार से मज़ाक नहीं करता था।
एक दिन वह चिल्लाया, “आम गिर रहा है!”
शेरू ने ध्यान नहीं दिया। आम सीधा उसके सिर पर गिरा।
बंदरू डाल से झुका। “इसे बाघ कहकर पुकारता तो सुनते?”
शेरू ने आम उठाया। “बाघ नहीं। आधा आम कहो।”
