वज्र आधा गिरा पेड़ दाँतों पर उठाकर पंचवन पहुँचा।
“मैं दस जंगलों में सबसे ताकतवर हाथी हूँ,” उसने कहा। “फिर बूढ़े गजराज झुंड के आगे क्यों चलते हैं?”
गजराज ने जवाब नहीं दिया। वह नदी के ऊपर नीचे उड़ती अबाबीलें देख रहे थे।
“पहाड़ियों पर बारिश है,” वह बोले। “अभी ऊँची जमीन पर चलो।”
आसमान नीला था। वज्र हँसा। “एक बादल से डर गए?”
वह कुछ जवान हाथियों को चौड़े नदी वाले रास्ते पर ले गया। गजराज मादाओं और बच्चों को साल के पेड़ों के बीच ऊँची पगडंडी से ले चले।
मोड़ तक पहुँचने से पहले बिजली कड़की।
भूरा पानी चट्टानों के चारों ओर उमड़ पड़ा। वज्र का दल भागा, मगर छोटा पीलू फिसलकर रेत के टापू पर रह गया। उसके और किनारे के बीच नदी चढ़ती गई।
“वहीं रहो!” वज्र चिंघाड़ा।
वह अकेला पानी में उतरा। तेज बहाव ने उसे धक्का दिया। उसने पैर जमाए, मगर वे कीचड़ में धँसते गए। पहली बार उसकी ताकत को धक्का लगाने के लिए मजबूत जमीन नहीं मिली।
ऊँचे किनारे पर गजराज का दल दिखाई दिया।
“पानी के नीचे पुरानी पत्थरीली धार है,” गजराज ने पुकारा। “तीन कदम ऊपर। पैर से खोजो।”
वज्र को पत्थर मिल गया। अब जमीन नहीं खिसकी।
गजराज ने हाथियों की कतार बनाई। हर हाथी ने आगे वाले की पूँछ सूँड़ से पकड़ी। छिपे पत्थर पर खड़ा वज्र सबसे आगे था। पीछे बारह हाथी एक साथ झुके।
उसने पीलू की ओर सूँड़ बढ़ाई। पीलू चूका और चीख पड़ा।
एक भारी लट्ठा पानी में घूमता हुआ आया।
“नीचे!” गजराज गरजे।
वज्र ने सिर झुका दिया। लट्ठा उसके दाँतों से टकराया। पैर काँपे, मगर पीछे का झुंड उसे थामे रहा। उसने लट्ठा हटाया और फिर सूँड़ बढ़ाई।
इस बार पीलू की छोटी सूँड़ उसकी सूँड़ से लिपट गई।
वज्र ने बच्चे को सीने से लगाया। पूरी कतार धीरे-धीरे पीछे चली और सब सूखी जमीन पर आ गए।
बारिश कानों पर ढम-ढम गिर रही थी। वज्र ने गजराज को देखा।
“आपको पत्थरों का रास्ता पता था।”
“तुम्हारी उम्र में मैं वहीं से बह गया था,” गजराज बोले। “सिर पर लगी गूमड़ अब भी याद है।”
वज्र ने अपना कीचड़ वाला माथा छुआ। “मुझे लगा ताकत का मतलब सबसे आगे जाना है।”
पीलू दोनों के बीच घुसा। “आज मतलब था मुझे न गिराना।”
बारिश रुकी तो वज्र ने रास्ते से लट्ठा हटा दिया। गजराज ने उसे अबाबीलों के संकेत, ऊँचे रास्ते और छिपे घाट दिखाए।
अब झुंड के आगे दो हाथी चलते थे—एक को याद था नदी कहाँ बह चुकी है, और दूसरा आने वाले रास्ते का सामना कर सकता था।
