भयंकर शेर सूरज निकलने से लेकर डूबने तक पंचवन में शिकार करता। भूख न होती, तब भी जानवरों के पीछे दौड़ता। जल्द ही जंगल के रास्ते खाली हो गए।
बरगद के नीचे सभा हुई। गजराज हाथी ने शेर से कहा, “अगर रोज एक जानवर आपकी गुफा में आए, तो क्या आप बाकी जानवरों का पीछा छोड़ देंगे?”
बिना मेहनत खाना मिलने की बात भयंकर को पसंद आई। “दोपहर से पहले एक जानवर,” वह बोला। “देर हुई तो मैं फिर शिकार करूँगा।”
कई उदास दिनों तक पर्ची निकलती रही। फिर चिंटू खरगोश का नाम आया।
दादी बुद्धिमती ने उसके पंजे पकड़े। “तुम छोटे हो,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “इसलिए कोई बड़ा उपाय साथ ले जाना।”
शेर की गुफा के रास्ते में चिंटू पुराने पत्थर के कुएँ पर रुका। नीचे का पानी काला और शांत था। वह झुका तो पानी में दूसरा खरगोश झुका। उसने खाँसी की तो कुएँ ने भी खाँसी लौटाई।
चिंटू के कान खड़े हो गए। बड़ा उपाय मिल गया था।
वह जान-बूझकर देर से गुफा पहुँचा।
“इतनी देर!” भयंकर गरजा। “और खाना भी इतना छोटा!”
चिंटू झुका। “हम छह खरगोश साथ निकले थे। दूसरे शेर ने रोक लिया। पाँच को खा गया और बोला कि पंचवन का असली राजा वही है।”
भयंकर की काली अयाल फूल गई। “मुझे उसके पास ले चलो!”
चिंटू उसे कुएँ तक लाया। “वह नीचे पत्थर के किले में छिपा है।”
शेर ने किनारे से झाँका। पानी में एक शेर उसे घूर रहा था। भयंकर ने दाँत दिखाए तो दूसरे ने भी दिखाए।
“बाहर आ!” भयंकर दहाड़ा।
कुएँ ने उसकी आवाज और जोर से लौटाई।
भयंकर किनारे पर चढ़ा। चिंटू चट्टान के पीछे भागा।
“यह जंगल मेरा है!”
“मेरा… मेरा… मेरा…” गूँज आई।
भयंकर ने पानी वाले शेर पर छलाँग लगा दी। बड़ा छपाका हुआ। परछाईं टूटी और कुआँ शांत हो गया।
कुछ देर बाद गीला पंजा किनारे पर दिखा। चिंटू ने पास की चिकनी डाल आगे कर दी। शेर ने पकड़ना चाहा, मगर पंजे फिसल गए। काला पानी उसकी अयाल के ऊपर बंद हो गया।
चिंटू बरगद की ओर दौड़ा।
“शेर खुद से लड़कर हार गया,” उसने हाँफते हुए बताया।
जानवर सावधानी से कुएँ तक आए। बात समझते ही बंदरू बंदर सबसे पहले चिल्लाया। पक्षी गाने लगे, हिरन खुले मैदान में दौड़े और गजराज ने चिंटू पर पानी का फव्वारा छोड़ दिया।
दादी ने उसकी नाक पोंछी। “बहुत बड़ा उपाय था।”
चिंटू हँसा। कुएँ से धीमी आवाज आई:
“उपाय… उपाय… उपाय…”
