गंगा की धरती पर आने की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, आज से बहुत-बहुत पहले, एक अच्छे और धैर्यवान राजा थे। उनका नाम था भगीरथ। उनके मन में उदासी थी। बहुत साल पहले, उनका पूरा परिवार गहरी-गहरी नींद में सो गया था — इतनी गहरी नींद कि सिर्फ़ एक पवित्र नदी का स्पर्श ही उनकी आत्माओं को जगा सकता था और उन्हें तारों के पास, घर भेज सकता था।
वह नदी कोई साधारण नदी नहीं थी। उसका नाम था गंगा, और वह दुनिया से बहुत ऊपर, आसमान के तारों के बीच चमकती हुई रहती थी।
तो राजा भगीरथ पहाड़ों की एक शांत जगह पर गए, हाथ जोड़े, और प्रार्थना करने लगे। तपती गर्मियों में भी प्रार्थना की, ठंडी सर्दियों में भी। बारिश गिरती रही, बर्फ़ भी, फिर भी भगीरथ प्रार्थना करते रहे। साल बीतते गए — एक साल, फिर बहुत सारे साल — पर भगीरथ ने हार नहीं मानी, क्योंकि उन्हें अपने परिवार से दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार था।
आखिर, आसमान ने उनकी बात सुन ली। "अच्छे राजा," ऊपर से एक प्यारी आवाज़ आई, "हम गंगा को धरती पर आने देंगे। पर एक बात ध्यान से सुनो। गंगा बहुत बलशाली है। वह ज़िद्दी और तेज़ है, पूरे आसमान जितनी ताकतवर। अगर वह सीधी धरती पर गिरी, तो उसकी ज़ोरदार धार पहाड़ों को हिला देगी और ज़मीन तक टूट जाएगी। सिर्फ़ भगवान शिव ही — जो अपने बर्फ़ीले पहाड़ पर शांति से बैठे रहते हैं — उसके गिरने को धीमा कर सकते हैं।"
तो भगीरथ ने एक बार फिर प्रार्थना की, इस बार शिव से। और शिव, जो सच्चे मन से की गई हर प्रार्थना से प्यार करते हैं, धीरे से मुस्कुराए और बोले, "उसे आने दो। मैं उसे थाम लूँगा।"
ऊपर आसमान में, गंगा ने यह सुना और वह चमचमाती हुई हँस पड़ी। "मुझे थाम लेंगे?" उसने कहा। "मैं तारों की नदी हूँ! मुझे कोई नहीं रोक सकता। मैं कूदकर सब कुछ बहा ले जाऊँगी!"
और फिर, वह कूद पड़ी।
वह सबसे ऊँचे तारे से नीचे आई, रात के आसमान में लुढ़कती हुई चाँदी की एक चमकती लकीर — किसी भी झरने से तेज़, चाँद से भी चमकीली। पूरी दुनिया ने साँस रोक ली।
पर कैलाश की बर्फ़ीली चोटी पर, शिव बस बैठे रहे — शांत, स्थिर, मुस्कुराते हुए, आँखें धीरे से बंद किए हुए। उनकी उलझी हुई जटाओं में छोटा-सा अर्धचंद्र धीरे-धीरे चमक रहा था। जब वह महान नदी गरजती हुई नीचे आई, तो शिव न हिले, न उनका चेहरा बदला, न उन्होंने आँखें खोलीं। उन्होंने बस अपना सिर थोड़ा-सा झुकाया — और गंगा को अपनी जटाओं में गिरने दिया।
और वाह, क्या जटाएँ थीं! गंगा उनमें ऐसे उतरी जैसे कोई झरना घने जंगल में समा जाता है। वह इधर-उधर भागी, बाहर निकलने का रास्ता ढूँढती रही, शिव की अनंत जटाओं में घूमती रही। पर जितनी गहरी वह गई, उतनी ही शांत होती गई। शिव की जटाएँ नरम थीं। उनका पहाड़ सुकून भरा था। धीरे-धीरे, आसमान की सबसे तेज़ नदी अपना रोष भूल गई। वह ठंडी और शांत होकर विश्राम करने लगी, और उनकी जटाओं में चमकने लगी — बिल्कुल उस छोटे-से चाँद के पास।
जब शिव ने महसूस किया कि गंगा अब शांत हो गई है, तो उन्होंने अपना सिर हल्के से झटका दिया। और उनकी जटाओं से वह महान नदी बाहर आई — एक भारी लहर में नहीं, बल्कि सात नरम, चाँदी जैसी धाराओं में, जो पहाड़ी से ऐसे उतरीं जैसे पानी से बनी चाँदनी हो।
नीचे इंतज़ार कर रहे भगीरथ अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर सके। वे चलने लगे, और वे छोटी-छोटी धाराएँ मिलकर उनके पीछे चलने लगीं — खुशी से, चुपचाप, जैसे कोई चाँदी का दोस्त उन पर भरोसा करने लगा हो। पहाड़ों से होकर वह बही, सोए हुए गाँवों के पास से, हरे-भरे खेतों के बीच से, लंबे रास्ते से होकर समंदर तक। और जहाँ-जहाँ उसका पानी धरती को छूता, फूल थोड़े और चमकते हुए खिलने लगते।
आखिर, गंगा का पानी उस जगह पहुँचा जहाँ भगीरथ का परिवार गहरी-गहरी नींद में सो रहा था। वह उनके ऊपर धीरे-धीरे बह गई — और एक-एक करके, उनकी आत्माएँ जाग गईं, छोटी-छोटी रोशनियों की तरह ऊपर उठीं, और तारों के पास, अपने घर लौट गईं।
भगीरथ ने हाथ जोड़ लिए। उनकी आँखों में खुशी के आँसू चमक रहे थे। लंबी प्रार्थना खत्म हो गई थी। हर साल का इंतज़ार सार्थक निकला था।
और गंगा? वह कभी नहीं गई। वह आज भी धरती पर बहती है — पर वह सच में शिव की जटाओं से भी कभी नहीं गई। दयालु पहाड़ वाले भगवान की कोई भी तस्वीर देखो, और तुम्हें वहाँ वह दिखेगी — उनकी उलझी जटाओं में चमकती चाँदी की एक धार, उनके अर्धचंद्र के बगल में आराम करती हुई।
रोचक बात: राजा भगीरथ गंगा को धरती पर लाए, इसलिए पहाड़ों में इस नदी को प्यार से भागीरथी भी कहा जाता है। और बहुत से मंदिरों में, शिव की जटाओं में पानी की एक छोटी-सी धार भी बनी दिखती है — वही नदी जो कभी तारों से गिरी थी!
भगीरथ ने अपने प्यारे परिवार के लिए हार नहीं मानी, भले ही इसमें बहुत साल लगे। और आसमान की सबसे ताकतवर नदी, जिस पल नरम होना सीख गई, उसी पल वह आशीर्वाद बन गई। सबसे बड़ी और ताकतवर चीज़ें भी, जब धैर्य और प्यार से थामी जाएँ, तो खूबसूरत हो जाती हैं।
कहानी समाप्त
