दुनिया का सबसे बहादुर घूँट

दुनिया का सबसे बहादुर घूँट


जब क्षीर सागर के मंथन से ख़तरनाक ज़हर निकलता है, तो दयालु शिव जी उसे पीकर अपने गले में सुरक्षित रोक लेते हैं — और उनका गला हमेशा के लिए नीला हो जाता है, जिससे उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगता है।

शिव जी के नीले गले की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब यह दुनिया बिल्कुल नई थी, तब एक दूध जैसा चमकता हुआ समंदर था। उसका नाम था क्षीर सागर। तारों की रोशनी में वह सफ़ेद और चाँदी जैसा चमकता था, जैसे किसी ने चाँदनी एक बड़े-से कटोरे में भर दी हो।

उस समंदर के अंदर एक बहुत ख़ास ख़ज़ाना छिपा था — अमृत, एक सुनहरा शहद जैसा पानी, जिसे देवता भी पीना चाहते थे। पर इतने बड़े समंदर में उस छोटे से ख़ज़ाने को कौन ढूंढता? देवताओं ने खूब सोचा। फिर उन्हें एक चतुर उपाय सूझा।

"हम इस समंदर को मथेंगे," उन्होंने कहा, "बिल्कुल वैसे जैसे दूध मथकर मक्खन निकालते हैं!"

पर यह काम बहुत बड़ा था। इसलिए देवता और असुर — दोनों हाथ मिलाकर साथ काम करने लगे। और क्या अनोखा मंथन था!

मथाने के लिए उन्होंने सुनहरे मंदाराचल पर्वत को ही उठा लिया और समंदर में खड़ा कर दिया — जैसे दुनिया का सबसे बड़ा लट्टू। रस्सी बन गया नेकदिल साँपों का राजा वासुकी, जो अपने कई चमकते सिरों के साथ पर्वत के चारों ओर लिपट गया। और नीचे, पानी के अंदर, भगवान विष्णु एक बड़े कछुए बन गए, जिन्होंने पर्वत को अपनी मज़बूत पीठ पर उठा रखा था, ताकि वह डूब न जाए।

"तैयार?" देवताओं ने साँप का एक सिरा पकड़कर पूछा।

"तैयार!" असुरों ने दूसरा सिरा पकड़ते हुए गरज कर कहा।

और फिर वे खींचने लगे — इधर से उधर, उधर से इधर — जैसे रस्साकशी का एक विशाल खेल। पर्वत घूमता रहा, घूमता रहा, और दूध जैसा समंदर झाग उठा और गुनगुनाने लगा। एक-एक करके लहरों से अनोखे ख़ज़ाने निकलने लगे — एक चाँद जैसी सफ़ेद गाय, एक कल्पना पूरी करने वाला पेड़, और तारों जैसे टिमटिमाते रत्न।

पर तभी — फुस्स्स!

लहरों से कुछ ऐसा निकला जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। काला, बैंगनी-हरा धुआँ — गाढ़ा और घूमता हुआ — जैसे कोई तूफ़ानी बादल समंदर से उठा हो। यह था हलाहल — एक बहुत ख़तरनाक ज़हर। जहाँ भी उसके धुएँ के हाथ पहुँचते, फूल मुरझा जाते और हवा गर्म हो जाती। धुआँ फैलने लगा — आसमान की ओर, धरती की ओर, तीनों लोकों की हर जीव की ओर।

देवता डर गए। असुरों ने रस्सी छोड़ दी। सब इधर-उधर भागने लगे और एक साथ चिल्लाए:

"कोई है? कृपया — हमारी मदद करो!"

दूर, बर्फ़ीले कैलाश पर्वत पर, शिव जी चुपचाप ध्यान में बैठे थे। उनकी जटाओं में छोटा-सा चाँद टिमटिमा रहा था, और उनका प्यारा साँप कंधों पर नरम गुलुबंद की तरह लिपटा था। उन्होंने वह पुकार सुनी। उन्होंने अपनी दयालु आँखें खोलीं।

और वे आ गए।

पूरी दुनिया ने साँस रोक ली। शिव जी ने समंदर के ऊपर फैलते काले धुएँ को देखा — वह धुआँ जो हर चिड़िया, हर फूल, हर नन्हे बच्चे को नुकसान पहुँचा सकता था। और जानते हो उन्होंने क्या किया? वे मुस्कुराए। एक छोटी-सी, शांत, प्यारी मुस्कान।

फिर शिव जी ने उस सारे ज़हर को अपनी अंजुली में उठा लिया — धुएँ का एक-एक तिनका भी नहीं छूटा — जैसे जार में बंद कोई काला तूफ़ान हो। सब लोग आँखें फाड़े, चुपचाप देखते रहे।

"यह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाएगा," शिव जी ने धीरे से कहा। "ना किसी जीव को, ना किसी फूल को, ना किसी लोक को।"

और फिर उन्होंने अपने हाथ उठाए — और पूरा ज़हर एक ही घूँट में पी गए।

पर यहाँ एक अचरज हुआ: शिव जी ने ज़हर को नीचे नहीं जाने दिया। उनकी प्यारी पत्नी माता पार्वती ने अपना कोमल हाथ उनके गले पर धीरे से रख दिया, ताकि ज़हर आगे न बढ़े। और शिव जी ने उसे वहीं, अपने गले में, सुरक्षित रोक लिया — जैसे कोई राज़ एक छोटे-से कमरे में बंद कर दिया गया हो। ज़हर ना उन्हें छुआ, ना किसी और को।

और फिर धीरे-धीरे, ठीक वहीं जहाँ पार्वती जी का हाथ था, शिव जी का गला चमकने लगा — नीला। एक गहरा, कोमल, सुंदर नीला — जैसे सूरज डूबने के तुरंत बाद का शाम का आसमान। वह हमेशा के लिए नीला रह गया, एक छोटी-सी रात के दीये की तरह जगमगाता हुआ, ताकि जो भी उन्हें देखे, उसे याद रहे।

उस दिन से शिव जी को एक नया नाम मिला — नीलकंठ, नीले गले वाले।

देवताओं और असुरों ने झुककर प्रणाम किया। फूलों ने फिर से सिर उठाए। हवा ठंडी और मीठी हो गई। और मंथन फिर शुरू हुआ — जब तक कि आख़िर में लहरों से चमकता हुआ अमृत निकल आया, सुनहरा और दमकता हुआ, और सब खुशी से झूम उठे।

पर शिव जी चुपचाप अपने बर्फ़ीले पहाड़ पर लौट गए, शांत बर्फ़ के बीच बैठ गए, और फिर से आँखें बंद कर लीं — मानो उन्होंने बस एक कड़वी दवा का घूँट पिया हो, ताकि किसी और को ना पीना पड़े।

और इसीलिए, आज भी, जब लोग मंदिर की ज्योति में शिव जी का नीला गला हल्का-सा चमकते देखते हैं, तो वे फुसफुसाकर कहते हैं: "वहाँ बैठे हैं सबसे दयालु भगवान — जिन्होंने ज़हर पी लिया, ताकि पूरी दुनिया सुरक्षित रहे।"

रोचक बात: शिव जी का नाम "नीलकंठ" दो शब्दों से बना है — "नील" यानी नीला, और "कंठ" यानी गला। आज भी हर तस्वीर और मंदिर में शिव जी का गला हल्का नीला दिखाया जाता है — समुद्र मंथन के समय से चला आ रहा उनका निशान।

जब कोई चीज़ सबके लिए बहुत मुश्किल और डरावनी थी, तब शिव जी आगे आए और उसे संभाल लिया — तारीफ़ के लिए नहीं, बल्कि प्यार के लिए। असली ताकत दूसरों की रक्षा करने में है, चाहे उसमें थोड़ी तकलीफ़ ही क्यों न हो। और कभी-कभी प्यार जो निशान छोड़ता है, उन्हीं पर हमें सबसे ज़्यादा गर्व होना चाहिए।


कहानी समाप्त