शाम होते ही काले पाल वाली नाव कोहरे से निकली।
“विरान के आदमी!” कलिंग बोला।
खुले समंदर में सन-स्किमर उस तेज नाव से नहीं बच सकती थी। कलिंग ने नाव मैंग्रोव के जंगल की ओर मोड़ दी। चाँदी जैसी जड़ें पानी में ऐसे उलझी थीं जैसे गीली सेवइयों से भरा कटोरा।
तारा ने उसे घूरा। “यह बचने का रास्ता नहीं है।”
“बड़ी नावें सेवइयों में फँस जाती हैं।”
सन-स्किमर तंग नहर में घुस गई। बड़ी नाव बाहर रुक गई, लेकिन डाकू तीन छोटी नावों में पीछे आ गए। उनकी लालटेनें जड़ों के बीच चमक रही थीं।
तभी पेड़ों से सफेद चाँद-पतंगे उतरे। वे एक नहर के ऊपर इकट्ठे हुए और पूरा रास्ता चमक उठा।
“काम के कीड़े!” कलिंग ने कहा।
अगले मोड़ पर पतंगे छह रास्तों में बँट गए। हर ओर डाकुओं की लालटेन दिख रही थी।
“अब इतने काम के नहीं रहे,” वह बोला।
तारा ने पापा की डायरी खोली। उसमें चाँद और पतंगे का चित्र था। नीचे लिखा था: चाँद-पतंगे सबसे पुरानी रोशनी के पीछे जाते हैं।
“अपनी लालटेन बुझाओ,” तारा ने कहा।
“इस अँधेरी भूलभुलैया में?”
“जल्दी!”
लालटेन बुझते ही चारों ओर अँधेरा छा गया। डाकू हँसे और अपनी लालटेनें ऊँची कर लीं। सारे पतंगे उनकी रोशनी पर टूट पड़े। गलत रास्ते चमक उठे।
तारा ने काले कम्पास का शीशा चाँद की ओर किया। उससे निकली पतली रोशनी पानी पर पड़ी। तीन पतंगे बाकी झुंड से अलग हुए और एक बहुत तंग सुरंग में चले गए।
“सबसे पुरानी रोशनी चाँद की है,” तारा बोली।
दोनों झुक गए। नाव जड़ों के नीचे से रगड़ खाती हुई निकली। पीछे से धमाका, दो छपाक और एक डाकू की आवाज आई, “मेरे कान में किसकी पतवार है?”
आगे काला तालाब था और रास्ता बंद। पतंगे पापा की डायरी पर बैठे। उनकी चमकीली धूल से एक छिपा चित्र दिखा—सबसे बड़ी जड़ के नीचे चाँद जैसी पतली दरार।
कलिंग ने नाव को एक ओर झुका दिया। मस्तूल पानी के पास आ गया और नाव उस दरार से फिसलकर खुले समंदर में निकल गई।
डाकुओं ने भी निकलने की कोशिश की। उनकी तीनों नावें जड़ के नीचे एक साथ फँस गईं।
पतंगों की चाँदी जैसी धूल डायरी पर जमा हुई और नक्शे का दूसरा टुकड़ा बन गई।
मैंग्रोव के भीतर से जोरदार छींक सुनाई दी। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
जल्द ही पूरा जंगल छींकते डाकुओं से गूँज रहा था।
