फुसफुसाते टापू की ओर पलायन

फुसफुसाते टापू की ओर पलायन


पापा के गायब होने के बाद विरान उनकी नाव छीनने आता है। कलिंग और तारा तूफान में भाग निकलते हैं और नक्शों से दूर ऐसे टापू पर पहुँचते हैं जहाँ पत्थर पहेली पूछते हैं। सही जवाब उन्हें काला कम्पास और चमकते नक्शे का पहला टुकड़ा देता है।

तूफान और व्यापारी विरान एक साथ घाट पर पहुँचे।

बारिश छतों पर ढोल पीट रही थी। रस्सियाँ हवा में कराह रही थीं। उसी बीच कलिंग ने विरान को दो भारी-भरकम आदमियों के साथ आते देखा। उसके हाथ में लाल मोहर वाला कागज था।

“तुम्हारे पापा को गायब हुए छह महीने हो गए,” विरान चिल्लाया। “अब उनका कर्ज भी मेरा है और उनकी नाव भी।”

सन-स्किमर ही पापा की छोड़ी हुई आखिरी चीज थी। कलिंग उसे देने वाला नहीं था।

उसने धीरे से कहा, “तारा, पीछे की रस्सी खोलो।”

“पहले ही खोल दी।” तारा पास आ गई। पापा की चमड़े वाली डायरी उसकी कमीज के अंदर छिपी थी। “तुम पाल संभालो। गलत फैसले मैं संभाल लूँगी।”

“कौन-से गलत फैसले?”

“जो अब हम करने वाले हैं।”

नाव छूटते ही विरान के आदमी उस पर कूदे। एक मछलियों की टोकरी में जा गिरा। दूसरे ने रस्सी पकड़ी, पर तारा ने उसे ऐसा झटका दिया कि उसकी टोपी समुद्र में उड़ गई।

तभी हवा ने सन-स्किमर को पकड़ लिया।

नाव लाइटहाउस के पास से निकलकर घर जितनी ऊँची लहरों में जा पहुँची। कलिंग पतवार से जूझ रहा था। तारा पानी के पीपे बाँध रही थी और बादलों को डाँट रही थी।

पीछे काले पाल वाली तेज नाव उनका पीछा कर रही थी। बिजली चमकी तो वह और पास दिखी।

“सामने चट्टानें!” तारा चिल्लाई।

दो चट्टानें किसी दैत्य के दाँतों की तरह खड़ी थीं। कलिंग ने आखिरी पल में पतवार मोड़ी। सन-स्किमर उनके बीच से फिसल गई। बड़ी नाव ने पीछे आने की कोशिश की और उसका आधा पाल जोरदार रर्राक के साथ फट गया।

सुबह तक तूफान उन्हें सभी जाने-पहचाने नक्शों से दूर ले आया। सामने चाँदी जैसे पत्थरों से घिरा एक छोटा टापू था।

पत्थर फुसफुसा रहे थे:

वह क्या है जो नाविक को समुद्र में राह दिखाता है, पर पानी को कभी नहीं छूता?

“कम्पास?” तारा ने कहा।

पत्थर हँसने लगे।

“बहुत ऊँचा लाइटहाउस?” कलिंग ने कहा।

एक पत्थर ने मुँह चिढ़ाने जैसी आवाज निकाली।

कलिंग ने ऊपर देखा। सुबह होने पर भी एक चमकीला तारा आसमान में था। पापा रात की यात्राओं में उसी की ओर उँगली उठाते थे।

“आसमान का तारा!” कलिंग बोला।

पत्थरों ने एक साथ मीठी-सी धुन छेड़ी। रेत में छिपा दरवाजा खुल गया। अंदर काले पत्थर का कम्पास था। उसके शीशे के नीचे चमकते नक्शे का पहला टुकड़ा रखा था।

कम्पास की सुई घूमी और अनजाने समंदर की ओर टिक गई।

तारा मुस्कराई। “रास्ता बड़ा समझदार लग रहा है।”

“वह सीधे अनजान जगह की ओर है।”

“मैंने भी तो यही कहा।”

दोनों ने फटा पाल चढ़ाया। पीछे पत्थर अब भी बहस कर रहे थे कि बहुत ऊँचा लाइटहाउस सच में गलत जवाब था या नहीं।