गर्मी में मैदान तिपतिया घास और ऊँचे फूलों से भर गया। बैंबी, फलीन और गोबो घास में दौड़ते, खाइयाँ लाँघते और दोस्त खरगोश की कहानियाँ सुनते। कोई खुश होकर सुनता, तो खरगोश की कहानी और लंबी हो जाती।
एक सुबह बड़े हिरनों का झुंड मैदान में आया। उनके सींग घास के ऊपर चमक रहे थे। फिर बूढ़ा हिरन अकेला निकला। बाकी सबने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया।
बैंबी पीछे जाना चाहता था, मगर माँ ने रोक लिया। “वह अकेला चलता है, क्योंकि जानता है कि कभी-कभी साथ रहना भी खतरा बनता है।”
गर्मी के बाद जंगल की आवाज़ बदल गई। जेज़ एक पेड़ से दूसरे तक चिल्लाते। तीतर बिना कारण पंख फड़फड़ाकर उड़ते। रास्तों पर ऐसी गंध आती जहाँ कोई जानवर नहीं गया था।
एक सुबह बैंबी और माँ मैदान पहुँचे। माँ ने बाहर कदम रखा, फिर जम गई।
हर पंछी चुप था।
घास के पार दो पैरों पर कोई खड़ा था। बैंबी ने जानवरों से “वह” नाम सुना था, मगर कभी देखा नहीं था। हवा में तेज़ अनजानी गंध थी।
माँ पलटी। “भागो!”
तेज़ धमाका हुआ। गोबो लड़खड़ाया। आंट ईना और फलीन उसके पास गईं। बैंबी की माँ सबको पेड़ों की ओर ले चली। दूसरा धमाका हुआ और बैंबी के पास वाले तने की छाल उड़ी।
वह तब तक भागा जब तक कुत्तों और चिल्लाने की आवाज़ बंद नहीं हुई।
“माँ?” उसने पुकारा।
जवाब नहीं आया। तभी बूढ़ा हिरन सामने खड़ा था। “अभी तुम्हारी माँ के पास समय नहीं है। क्या तुम अकेले नहीं रह सकते?”
बात चुभी, मगर बैंबी चुप हो गया। शाम को माँ लौटी और उसे खूब चूमा। आंट ईना और फलीन भी आईं, मगर गोबो साथ नहीं था। खतरे के बीच वह पीछे छूट गया था।
किसी को नहीं पता था कि “वह” उसे ले गया या गोबो अँधेरे जंगल में कहीं छिपा था।
कहानी समाप्त
