साल बीत गए। अलादीन अच्छे कपड़े पहनता, सोचकर बोलता और बाज़ार के व्यापारियों की बात सुनता। किसी को पता नहीं था कि बत्ती के जिन्न ने उसका घर भरा है और गुफा के रत्न उसकी जेबों में चमकते हैं।
एक दिन सुल्तान ने राजकुमारी बदरुलबदूर के नहाने जाने तक सारी दुकानें बंद रखने का हुक्म दिया। अलादीन दरवाज़े के पीछे छिपा था। उसने राजकुमारी को घूँघट उठाते देखा और उसी पल उससे शादी की ठान ली।
माँ के हाथ से तकली लगभग गिर गई।
“सुल्तान हमें महल से हँसकर निकाल देगा।”
अलादीन ने चीनी-मिट्टी का कटोरा गुफा के रंगीन रत्नों से भर दिया।
“उन्हें ये दे देना।”
माँ एक हफ़्ते तक दरबार में बोलने से डरती रही। आख़िर सुल्तान ने बुलाया। कपड़ा हटते ही माणिक और हीरे सिंहासन तक रोशन करने लगे।
सुल्तान बहुत खुश हुआ, मगर बड़ा वज़ीर राजकुमारी की शादी अपने बेटे से चाहता था। उसने जवाब तीन महीने बाद देने की सलाह दी।
तीन महीने पूरे होने से पहले ढोल बजाकर वज़ीर के बेटे की शादी की खबर आई। अलादीन ने परेशान होकर बत्ती रगड़ी।
रात में जिन्न दूल्हे का पूरा बिस्तर अलादीन के घर ले आया। घबराया युवक बाहर ठिठुरता रहा। अलादीन ने राजकुमारी से कहा कि सुल्तान पहले उसकी बात सुनने का वादा कर चुके हैं। सुबह जिन्न सबको बिना चोट पहुँचाए वापस रख आया।
दूसरी रात भी ऐसा हुआ। वज़ीर के बेटे ने शादी से मना किया और सारे जश्न से भाग गया।
तीन महीने पूरे हुए तो अलादीन की माँ फिर गई। वज़ीर ने सुल्तान से कठिन माँग रखवाई—रत्नों की चालीस थालियाँ, चालीस सेवकों के सिर पर, और हर सेवक के साथ एक और सजा हुआ आदमी।
माँ फीके चेहरे के साथ घर लौटी। अलादीन ने बत्ती रगड़ी।
शाम से पहले अस्सी सुंदर कपड़े वाले सेवक नगर से गुज़रे। चालीस सोने की थालियों में पहले से भी चमकीले रत्न थे। लोग छतों और गलियों में भर गए। सुल्तान अब अलादीन की ताक़त पर शक नहीं कर सकता था।
उसने युवक को होने वाले दामाद की तरह अपनाया। अलादीन ने सुल्तान को अपना वादा निभाने पर मजबूर किया था, इसलिए राजकुमारी भी उससे मिलने को तैयार हुई।
