अलादीन तीन नीचे वाले कमरों से तेज़ी से निकला। हर कमरे में चार सोने के घड़े थे, मगर उसने कपड़ों को उनसे छूने नहीं दिया। आगे ऐसा बाग था, जिसके पेड़ों पर लाल, नीले, हरे और सफ़ेद काँच जैसे फल चमक रहे थे।
उसने जेबें रंगीन टुकड़ों से भरीं, सीढ़ियाँ चढ़ीं और कोने में धुएँ वाली पुरानी बत्ती पाई। वह माँ की सबसे पुरानी हाँडी से भी सस्ती लग रही थी। अलादीन ने तेल फेंका और उसे कपड़ों में छिपा लिया।
गुफा के मुँह पर जादूगर ने हाथ बढ़ाए।
“पहले बत्ती दो।”
“पहले मुझे ऊपर खींचिए,” अलादीन बोला। भरी जेबों के कारण वह आख़िरी सीढ़ी नहीं चढ़ पा रहा था।
दोनों बहस करने लगे। बेचैन जादूगर ने आग में चूरा फेंका और मंत्र बोला। पत्थर बंद हो गया। अलादीन नीचे फँस गया। जादूगर अफ़्रीका लौट गया। उसे लगा बत्ती हमेशा के लिए खो गई।
दो दिन अलादीन अँधेरे में भटका। हाथ जोड़ते समय अंगूठी रगड़ गई।
बहुत बड़ा जिन्न सामने आया।
“मैं अंगूठी का सेवक हूँ। क्या चाहिए?”
“मुझे घर ले चलो!”
ज़मीन घूमी। आँख खुली तो अलादीन जादूगर की बुझी आग के पास था। वह माँ के पास भागा, पूरी बात बताई और भूख लगने तक सोता रहा।
घर में खाना नहीं था। माँ ने गंदी बत्ती बेचने के लिए साफ़ करनी चाही। जैसे ही उन्होंने रगड़ा, पहले से भी बड़ा जिन्न छत तक उठ गया।
“मैं बत्ती का सेवक हूँ!”
माँ बेहोश हो गई। अलादीन ने डर दबाकर खाना माँगा। जिन्न बारह चाँदी की थालियों में मांस, फल, मिठाई, गरम रोटी और दो प्याले ले आया।
कई दिन घर शाही रसोई जैसा महकता रहा। पैसे खत्म हुए तो अलादीन ने एक चाँदी की थाली बेची। बेईमान व्यापारी ने केवल एक सिक्का दिया। बाद में अच्छे जौहरी ने हर बची थाली के बहत्तर सिक्के दिए।
अब अलादीन खज़ाना पहचानने लगा था। गुफा के “काँच” वाले फल असल में बड़े माणिक, पन्ने, नीलम और हीरे थे।
उसने रत्न छिपाए—और मैली पुरानी बत्ती को उनसे भी ज़्यादा संभालकर रखा।
