चीन के एक नगर में अलादीन रहता था। उसके पिता मुस्तफ़ा गरीब दर्ज़ी थे। काम सीखने के बदले अलादीन गलियों में खेलता। मुस्तफ़ा की मौत के बाद माँ सुबह से रात तक रूई कातती और बेटा बाज़ार में खेलों के पीछे भागता रहता।
एक दिन अच्छे कपड़े पहने अजनबी ने उसे ध्यान से देखा। वह अफ़्रीका का जादूगर था। उसने पूरी दुनिया में ऐसी छिपी बत्ती खोजी थी, जिस तक केवल यही लड़का पहुँच सकता था।
मुस्तफ़ा की मौत सुनकर अजनबी रोने लगा।
“मैं तुम्हारे पिता का बिछड़ा भाई हूँ,” उसने कहा, हालाँकि मुस्तफ़ा ने कभी किसी भाई का नाम नहीं लिया था।
उसने अलादीन को सोना दिया, अच्छे कपड़े दिलाए और दुकान खुलवाने की बात की। माँ को शक था, मगर अजनबी खाना लाया और मुस्तफ़ा की बातें प्यार से करता रहा। जल्द अलादीन उसे चाचा कहने लगा।
अगली छुट्टी में जादूगर उसे नगर के बागों से बहुत दूर ले गया। दो पहाड़ों के बीच रास्ता पतला हो गया।
“सूखी लकड़ियाँ लाओ,” जादूगर ने कहा।
उसने आग जलाई, खुशबू वाला चूरा डाला और अनजान शब्द बोले। बादल गरजे। धरती फटी और पीतल के छल्ले वाला चपटा पत्थर दिखाई दिया।
अलादीन भागने लगा, मगर जादूगर ने पकड़ लिया।
“इस पत्थर के नीचे तुम्हारा खज़ाना है,” उसने कहा। “माता-पिता का नाम बोलकर इसे उठाओ। तीन कमरों में सोने के घड़ों को मत छूना। बाग पार करके पचास सीढ़ियाँ चढ़ना। ऊपर जलती बत्ती मिलेगी। उसका तेल फेंककर उसे मेरे पास लाना।”
उसने बचाव के लिए अलादीन की उँगली में अंगूठी पहनाई।
लड़के के हाथ लगाते ही पत्थर उठ गया। नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।
“आप भी चलिए,” अलादीन बोला।
“मेरे जाते ही रास्ता बंद हो जाएगा,” जादूगर ने कहा।
अलादीन ने उस मुस्कराते आदमी को देखा, जो उसका चाचा नहीं था, फिर काले रास्ते को। डर से ज़्यादा जानने की इच्छा ने उसे खींचा। वह कपड़े समेटकर नीचे उतर गया।
ऊपर आग के पास खड़े जादूगर की दोस्त वाली मुस्कान गायब हो चुकी थी।
