बीरबल की बुद्धिमानी की एक कहानी
बहुत समय पहले, आगरा शहर में एक बड़ा लाल महल था। उसकी मीनारें इतनी ऊँची थीं कि बादलों को छूती लगती थीं। उस महल में रहते थे सम्राट अकबर, एक बुद्धिमान राजा जिन्हें सोने-चाँदी से भी ज़्यादा तेज़ दिमाग़ पसंद था।
वहाँ से दूर, नदी किनारे एक छोटे गाँव में, रहता था एक ग़रीब जवान लड़का जिसका नाम था महेश दास। उसके परिवार के पास बस एक छोटी झोंपड़ी और कुछ बकरियाँ थीं। पर महेश दास के पास एक ऐसी चीज़ थी जो कोई उससे चुरा नहीं सकता था — एक बहुत तेज़ दिमाग़। वह ऐसी पहेलियाँ सुलझा देता था जो गाँव के बड़े-बूढ़ों को भी उलझा देतीं।
"तुम्हें आगरा जाना चाहिए," एक शाम उसकी माँ ने कहा। "तुम्हारे जैसा दिमाग़ यहाँ बर्बाद नहीं होना चाहिए। सम्राट के दरबार जाओ।"
तो महेश दास एक लाठी, कुछ सिक्के, और अपनी माँ का आशीर्वाद लेकर आगरा की ओर चल पड़ा।
जब वह पहुँचा, महल के फाटक पर ऊँचे-ऊँचे पहरेदार खड़े थे। महेश दास के पास न कोई पत्र था, न कोई बड़ा नाम — सिर्फ़ उसकी बुद्धि थी। इसलिए हर सुबह, वह चुपचाप महल की सीढ़ियों पर बैठ जाता, धीमे स्वर में गाने गाता, इस उम्मीद में कि कोई उस पर ध्यान दे।
कई दिनों तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। पर महेश दास ने हार नहीं मानी।
एक दोपहर, सम्राट अकबर वहाँ से गुज़रे, गहरी सोच में डूबे हुए। वे यह सोच रहे थे कि सचमुच बुद्धिमान लोगों को कैसे ढूँढा जाए। सीढ़ियों पर बैठे उस शांत जवान लड़के ने उनका ध्यान खींच लिया।
"तुम वहाँ," अकबर ने पुकारा। "तुम हर दिन यहाँ क्यों बैठे रहते हो?"
महेश दास उठ खड़ा हुआ और झुककर प्रणाम किया। "बस एक मौक़े के लिए, महाराज। यह दिखाने का मौक़ा कि एक तेज़ दिमाग़ कहीं से भी आ सकता है।"
तोडरमल नाम के एक घमंडी मंत्री ने हाथ की आड़ में हँस दिया। "बस एक और भिखारी, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ। इसे भगा दीजिए।"
पर अकबर ने चुप रहने का इशारा किया। उनके मन में एक विचार आया — एक परीक्षा।
सम्राट झुके और चाक से पत्थर के फ़र्श पर एक सीधी रेखा खींची। "इस रेखा को छोटा करो," उन्होंने कहा, "पर इसे छुए बिना। इसका एक कण भी मत मिटाना। अगर तुम ऐसा कर सको, तो मेरे दरबार में तुम्हारे लिए जगह है।"
पूरा आँगन चुप हो गया। बिना छुए कोई रेखा को कैसे छोटा कर सकता है?
महेश दास ने रेखा को बस एक पल देखा। फिर उसने चाक उठाया और, सम्राट की रेखा को बिना छुए, उसके बग़ल में एक दूसरी रेखा खींच दी — एक बहुत लंबी रेखा।
"हो गया, महाराज," उसने झुककर कहा।
अकबर ने भौंहें सिकोड़ीं। "मैंने तुमसे रेखा छोटी करने को कहा था। तुमने तो इसे छुआ ही नहीं।"
महेश दास मुस्कुराया। "क्षमा करें, महाराज, पर फिर से देखिए। आपकी रेखा ख़ुद तो छोटी नहीं हुई। पर इस नई, लंबी रेखा के बग़ल में — क्या यह पहले से छोटी नहीं दिखती?"
पूरा आँगन देखता रह गया। यह सच था। चाक का एक कण भी छुए बिना, महेश दास ने रेखा को छोटा दिखा दिया था।
अकबर ज़ोर से हँस पड़े, बहुत ख़ुश होकर। "चतुराई," उन्होंने कहा, "हमेशा किसी चीज़ को बदलने में नहीं होती। कभी-कभी यह उसे देखने का तरीक़ा बदलने में होती है। उठो, महेश दास — नहीं, उठो, बीरबल, क्योंकि आज से मैं तुम्हें यही बुलाऊँगा। मेरे दरबार में तुम्हारी जगह है।"
और इस तरह महेश दास, वह ग़रीब लड़का जो एक लाठी लेकर आगरा आया था, बन गया बीरबल — सम्राट का सबसे भरोसेमंद दोस्त और मंत्री, जिसकी बुद्धिमानी ने आने वाले सालों तक कई पहेलियाँ सुलझाईं।
उसकी माँ को फिर कभी ख़ाली कटोरे की चिंता नहीं करनी पड़ी।
"एक चतुर दिमाग़ हमेशा किसी समस्या को बदलकर नहीं सुलझाता — कभी-कभी, वह उसे देखने का नज़रिया बदलकर सुलझाता है।"
कहानी समाप्त
