शहर में कितने कौवे हैं?

शहर में कितने कौवे हैं?


एक ईर्ष्यालु दरबारी अपनी सबसे क़ीमती हवेली की शर्त लगाता है कि बीरबल आगरा के कौवों की सही संख्या नहीं बता सकते। बीरबल का जवाब ऐसा है जिसे कोई ग़लत साबित नहीं कर सकता — और जीतने के बाद उनकी नम्रता दरबारी को पहेली से भी बड़ा सबक सिखाती है।

बीरबल की बुद्धिमानी की एक कहानी

आगरा के दरबार में उस दिन कुछ ख़ास होने वाला था। किसी को इसका पता नहीं था — सिवाय शायद सम्राट अकबर के चेहरे पर आई उस छोटी, शरारती मुस्कान के।

दरबार उस दिन खचाखच भरा था। सेनापति, कवि, और ख़ज़ांची, सब अपनी-अपनी जगह बैठे थे। सबसे आगे, शांत और मुस्कुराते हुए, बैठे थे बीरबल — मानो उन्हें पहले से पता हो कि आज कुछ मज़ेदार होने वाला है।

पास ही बैठा था कुबेर सिंह, एक धनी और घमंडी दरबारी। वह हमेशा जलता था कि बीरबल सम्राट के सबसे पास बैठते हैं। "एक ग़रीब आदमी का बेटा," वह अक्सर बुदबुदाता, "और सम्राट उसकी हर बात पर हँसते हैं!"

आज, कुबेर सिंह को यक़ीन था कि उसका मौक़ा आ गया है।

अकबर ने हाथ उठाया। "आज सुबह से मेरे मन में एक अजीब सवाल घूम रहा है," उन्होंने कहा। "हमारे इस आगरा शहर में आख़िर कितने कौवे रहते हैं?"

पूरे दरबार में हँसी और फुसफुसाहट फैल गई। कौवे गिनना? यह तो पागलपन जैसा काम लगता था!

कुबेर सिंह फुर्ती से खड़ा हुआ। "महाराज," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "यह सवाल तो साधारण लोगों के लिए बहुत मुश्किल है। पर हमारे 'महाबुद्धिमान' बीरबल जी को तो सब कुछ पता है, है ना?"

फिर उसने एक क़दम और आगे बढ़ाया। "महाराज, अगर इजाज़त हो, तो एक शर्त रखते हैं। अगर बीरबल जी ठीक-ठीक संख्या बता दें, तो मैं उन्हें अपनी सबसे अच्छी हवेली दे दूँगा। पर अगर वे ग़लत निकले, तो उन्हें सबके सामने मानना होगा कि वे इतने बुद्धिमान नहीं हैं!"

पूरा दरबार चुप हो गया। यह अब मज़ाक़ नहीं रहा था।

अकबर ने ज़रा चिंता से बीरबल की ओर देखा। "बीरबल, तुम चाहो तो इस शर्त को ठुकरा सकते हो।"

पर बीरबल बस मुस्कुराए और उठ खड़े हुए। "महाराज, मुझे मंज़ूर है।"

बीरबल ने दरबार में धीरे-धीरे नज़र घुमाई। फिर, बिना एक पल भी सोचे, उन्होंने ऐलान किया, "महाराज, आगरा शहर में ठीक-ठीक निन्यानवे हज़ार नौ सौ निन्यानवे कौवे हैं।"

कुबेर सिंह ज़ोर से हँस पड़ा। "निन्यानवे हज़ार नौ सौ निन्यानवे?! यह संख्या आपने कहाँ से निकाली? अगर मैं सैनिक भेजकर गिनवाऊँ, और एक भी कम या ज़्यादा निकला — तो?"

"भेज दीजिए, महाराज," बीरबल शांति से बोले। "पर पहले मेरी बात सुन लीजिए।"

"अगर एक कौवा कम मिले," बीरबल ने समझाया, "तो घबराइए मत। इसका मतलब बस इतना है कि वह कौवा किसी दूसरे गाँव में अपने रिश्तेदारों से मिलने गया है। कौवे भी तो हमारी तरह अपने परिवार से मिलना पसंद करते हैं।"

दरबार में हल्की हँसी फैल गई। कुबेर सिंह का चेहरा लाल हो गया, पर उसने हार नहीं मानी। "और अगर एक कौवा ज़्यादा निकले, बीरबल जी?"

बीरबल मुस्कुराए, मानो उन्हें यह सवाल पहले से मालूम था। "उतना भी आसान है। इसका मतलब है कि किसी कौवे के रिश्तेदार आगरा घूमने आए हैं!"

इस बार पूरा दरबार खुलकर हँस पड़ा। पर कुबेर सिंह ने एक आख़िरी कोशिश की। "और अगर आपके सैनिक पूरे शहर में एक भी कौवा न ढूँढ पाएँ, बीरबल जी?"

बीरबल ने शांति से कंधे उचकाए। "तब समझ लीजिए कि उस दिन आगरा के सारे कौवे किसी बड़ी शादी में गए हुए हैं। आख़िर शादी में कौन नहीं जाना चाहता — कौवे भी!"

पूरा दरबार ठहाकों में डूब गया। ख़ुद अकबर अपनी गद्दी से उठ खड़े हुए, हँसते-हँसते उनकी आँखों में पानी आ गया। "बीरबल! तुमने मेरे सवाल का ऐसा जवाब दिया है जिसे कोई कभी ग़लत साबित नहीं कर सकता!"

कुबेर सिंह शर्म से चुपचाप अपनी जगह बैठ गया।

पर बीरबल, जो कभी किसी को छोटा दिखाकर ख़ुश नहीं होते थे, उसकी ओर मुड़े। "कुबेर सिंह जी, मुझे आपकी हवेली नहीं चाहिए। मैं बस यह दिखाना चाहता था कि जीतने के लिए धन-दौलत नहीं, बस थोड़ी-सी सूझ-बूझ चाहिए।"

दरबार में धीरे-धीरे तालियाँ गूँजने लगीं। कुबेर सिंह ने सिर उठाया, और पहली बार, उसकी आँखों में जलन नहीं, सच्चा सम्मान था। "बीरबल जी," वह धीरे से बोला, "आज मैंने सीखा कि असली जीत वह है जो किसी का दिल न दुखाए।"

"सबसे तेज़ जवाब वह नहीं होता जो सटीक हो, बल्कि वह होता है जिसे कोई ग़लत साबित न कर सके — और सबसे बड़ी जीत वह होती है जो किसी को हराकर नहीं, बल्कि किसी का दिल जीतकर मिलती है।"


कहानी समाप्त


📖 नए शब्द सीखिए

अभिमानी — अपने बारे में बहुत ज़्यादा घमंड करने वाला। कुबेर सिंह एक अभिमानी दरबारी था। विजयी — जीत हासिल करने वाला। कुबेर सिंह को यक़ीन था कि वह विजयी होगा, पर वह ग़लत निकला।