मुस्कुराता पत्थर

मुस्कुराता पत्थर


बहुत समय पहले, अहल्या नाम की एक प्यारी औरत खाली बगीचे में पत्थर बनकर चुपचाप इंतज़ार करती रहीं — फिर नन्हे राम के एक नरम क़दम ने उन्हें मुस्कुराते हुए जगा दिया।

एक प्यारी अहल्या, एक लंबा इंतज़ार, और एक नरम क़दम की कहानी

बहुत समय पहले की बात है। घने हरे जंगल के एक शांत कोने में एक छोटा-सा आश्रम था। वहाँ एक प्यारी और नेक औरत रहती थीं — अहल्या। उनके साथ रहते थे उनके पति, बड़े विद्वान महर्षि गौतम। अहल्या सब जीवों से प्यार करती थीं। वे पक्षियों को दाना डालतीं, फूलों को पानी देतीं, और काम करते-करते धीरे-धीरे गाती रहतीं। जो भी आश्रम में आता, खुश होकर लौटता।

फिर एक दिन बहुत दुख की बात हुई। अहल्या पर एक उदास जादू आकर बैठ गया — क्यों, यह कोई ठीक से नहीं जानता — और वे बिल्कुल पत्थर जैसी स्थिर हो गईं। बस, अपने ही बगीचे में, प्यारी अहल्या एक शांत भूरे पत्थर बन गईं। अब वे न चल सकतीं थीं, न बोल सकतीं थीं, न मुस्कुरा सकतीं थीं।

महर्षि गौतम का दिल बहुत दुखी हुआ और वे कहीं दूर चले गए। छोटा-सा आश्रम खाली हो गया। दीये बुझ गए। बगीचा बिखर गया। और पत्थर वहीं अकेला खड़ा रह गया।

पर पत्थर भी इंतज़ार कर सकते हैं। और यह पत्थर इंतज़ार करता रहा — भीतर अब भी एक दिल धीरे-धीरे सपने देखता रहा।

मौसम आते गए, जाते गए। बारिश उस पर धीरे-धीरे बरसती रही। सुनहरे पत्ते गिरकर उसे चादर की तरह ढक गए। हरी काई उस पर चढ़कर ओढनी जैसी हो गई। नन्हे पक्षियों ने ऊपर की टहनियों में घोंसले बनाए और हर सुबह उसके लिए गाने गाए, जैसे कह रहे हों, हम यहीं हैं। हमने तुम्हें भूला नहीं है।

साल दर साल, पत्थर इंतज़ार करता रहा।

फिर, एक प्यारी सुबह, जंगल के रास्ते पर तीन मुसाफ़िर आते दिखे। आगे थे महान ऋषि विश्वामित्र, अपनी लंबी सफ़ेद दाढ़ी वाले। उनके पीछे चल रहे थे दो भाई — राम, प्यारे और बहादुर, और उनका भाई लक्ष्मण, जो हर जगह उनके साथ रहता था। वे दूर के एक शहर जा रहे थे, और उनका रास्ता उसी शांत बगीचे से होकर जाता था।

जब राम पत्थर के पास से गुज़रे, वे धीमे हो गए। पत्थर में कुछ ऐसा था कि वे रुक गए। पत्थर... उदास लग रहा था। तो राम उसके और पास गए, आँखों में दया लिए — जैसे हम किसी ऐसे दोस्त के पास जाते हैं जो बहुत देर से अकेला बैठा हो।

और तभी, राम के नन्हे पैरों की धूल उस पत्थर को छू गई।

फिर जो हुआ, वह शांत और अद्भुत था। जहाँ उनका क़दम लगा था, वहाँ एक हल्की सुनहरी रोशनी खिली। भूरा पत्थर चमकने लगा, सुबह की धूप जैसा गर्म। वह झिलमिलाया... चमका... और फिर, रोशनी के अंडे की तरह धीरे से खुल गया — और वहाँ खड़ी थीं अहल्या! फिर से जीवंत! गालों में रंग, साँसों में जान, और चेहरे पर सबसे प्यारी मुस्कान।

वे मुस्कुराते हुए जागी थीं।

जादू खत्म हो गया। इंतज़ार के सारे लंबे साल धूप में पिघली बर्फ की तरह गायब हो गए। और किसी ने उन्हें डाँटा नहीं। किसी ने कुछ नहीं पूछा। बस उनका स्वागत हुआ — जैसे लंबी रात के बाद पूरी दुनिया सुबह का स्वागत करती है।

अहल्या ने हाथ जोड़े और नन्हे राजकुमार को प्रणाम किया। पर राम और लक्ष्मण, जो बहुत प्यारे और संस्कारी बच्चे थे, उन्होंने भी प्रणाम किया और उनके चरण छुए — क्योंकि वे बड़ी थीं, और वे हमेशा से प्यार की हक़दार थीं।

ऊपर आसमान से फूल गिरने लगे, हल्की बारिश की तरह — क्योंकि ऊपर वाले भी खुश थे कि प्यारी अहल्या फिर से घर आ गईं।

और जानते हो सबसे अच्छी बात क्या थी? विश्वामित्र बड़ी गहरी, समझदारी भरी मुस्कान से मुस्कुराए, क्योंकि उन्हें पहले से पता था। और थोड़ी देर बाद महर्षि गौतम भी आश्रम लौट आए, खुली बाँहों के साथ। छोटा-सा घर फिर से दीयों और हँसी से जगमगा उठा। अहल्या का इंतज़ार खत्म हो गया। उनका दिल, जो इतनी देर चुपचाप सोया रहा, अब जाग गया था — और पूरा हो गया था।

उस शाम, जब तीनों मुसाफ़िर आगे बढ़े, तो राम ने एक बार पीछे मुड़कर आश्रम को देखा। खिड़कियों से गर्म रोशनी झलक रही थी और बगीचे पर पक्षियों की मीठी आवाज़ तैर रही थी। वे मुस्कुराए, और सुनहरी शाम में आगे बढ़ गए — दिल पहले से थोड़ा हल्का लिए।

रोचक बात: इस कहानी की सबसे पुरानी किताबों में लिखा है कि जैसे ही राम के चरण पत्थर को छुए, आसमान से फूलों की बारिश होने लगी। आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि नरम दिल और प्यार भरा छूना सबसे गहरे दुख को भी दूर कर सकता है।

अहल्या ने बहुत लंबा इंतज़ार किया — पर आखिर में दया उन तक पहुँच ही गई। जब कोई प्यारा इंसान पास आता है, तो कोई भी दुख हमेशा नहीं रहता। हर किसी को एक प्यारी बात, एक गर्म मुस्कान, और एक और मौका मिलना चाहिए।


कहानी समाप्त