एक राजा की धैर्य वाली इच्छा की कहानी
बहुत समय पहले की बात है। सरयू नदी के किनारे अयोध्या नाम की एक सुनहरी नगरी थी। शाम को उसके महल जगमगाते थे, और नदी पर छोटे-छोटे दीये तैरते थे — जैसे तारे पानी पर उतर आए हों। वहाँ दशरथ नाम के एक अच्छे और दयालु राजा राज करते थे। पूरी नगरी उनसे बहुत प्यार करती थी।
पर राजा दशरथ के मन में एक छोटी-सी उदासी थी। उनकी तीन प्यारी रानियाँ थीं — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा — पर महल में किसी बच्चे के नन्हे कदमों की आहट नहीं सुनाई देती थी। राजा की बस एक ही इच्छा थी — उन्हें अपने बच्चे चाहिए थे।
राजा ने रोना-धोना नहीं किया। एक बसंत की सुबह वे घर के बुद्धिमान ऋषि वसिष्ठ जी के पास गए और अपने मन की बात कही। वसिष्ठ जी ने प्यार से कहा, "चलो, हम सब मिलकर प्रार्थना करते हैं। धैर्य और अच्छे मन से की गई इच्छा ज़रूर पूरी होती है।"
फिर एक बड़े हवन की तैयारी हुई। श्रृंगी ऋषि उसे करवाने आए। नदी किनारे पवित्र अग्नि-वेदी बनी। कई दिनों तक ऋषियों ने प्यारे मंत्र गाए और लपटों में सुनहरा घी डाला। हर तरफ़ फूलों की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। राजा और तीनों रानियाँ हाथ जोड़कर बैठे रहे, और उनके दिलों में शांत उम्मीद थी।
जब हवन पूरा हुआ, तो एक अद्भुत बात हुई। लपटें ऊँची और चमकीली हो गईं — और उस चमकती अग्नि में से एक चमकता देव-रूप निकला, सोने जैसा दमकता हुआ। उसके हाथ में सोने का एक कटोरा था, जो छोटे सूरज की तरह चमक रहा था। उस कटोरे में थी मीठी, गरम दिव्य खीर — स्वर्ग से भेजी हुई।
उस देवता ने कहा, "यह खीर अपनी रानियों को दो, और तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी।"
राजा दशरथ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने खीर तीनों रानियों में बाँटी — आधी कौशल्या को, एक प्यारा हिस्सा कैकेयी को, और प्यारी सुमित्रा को दो हिस्से, क्योंकि उनका हिस्सा बहुत खास था। रानियों ने आँखों में आश्चर्य लिए अपनी हथेलियों में खीर ली। मानो पूरा महल साँस रोककर मुस्कुरा रहा था।
बारह महीने बाद, जब अयोध्या में फिर बसंत आया, राजा की इच्छा पूरी हुई — एक नहीं, चार बार!
पहले, उस सुबह जब आसमान में पाँच चमकीले ग्रह झिलमिला रहे थे, रानी कौशल्या के यहाँ बेटा हुआ। उसकी आँखें कमल जैसी कोमल थीं, और जो भी उसे देखता, मुस्कुरा उठता। फिर रानी कैकेयी के प्यारे बेटे का जन्म हुआ। और रानी सुमित्रा को — याद है ना, उनके दो हिस्से? — जुड़वा बेटे मिले!
पूरी नगरी में खुशी छा गई। बादलों से फूलों की बारिश हुई। गलियों में संगीत गूँजा। बच्चे मिठाई लेकर नाचने लगे, और राजा ने सबको उपहार बाँटे — अमीर हो या गरीब।
ग्यारह दिन बाद, प्यारे वसिष्ठ जी ने हर पालने पर झुककर धीरे से एक नाम कहा।
"यह है राम," उन्होंने कहा, "क्योंकि यह सबको खुश करेगा।" और सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
"यह है भरत, जो सबका ख्याल रखेगा।" और सब फिर मुस्कुराए।
"और यह हैं लक्ष्मण, भाग्यशाली बेटा, और शत्रुघ्न, बहादुर बेटा।" सबने उनके नाम सुनकर भी मुस्कुराया।
चार नन्हे राजकुमार। एक खुश महल के चार छोटे-छोटे दीये।
दादी-नानी उन नन्हे दिनों की एक प्यारी कहानी सुनाती हैं। नन्हा लक्ष्मण बहुत रोया करता था, और कुछ भी उसे शांत नहीं कर पाता था — फिर वसिष्ठ जी मुस्कुराए और उसका पालना नन्हे राम के पास रख दिया। लक्ष्मण तुरंत चुप हो गया। उसने अपना नन्हा हाथ बढ़ाकर भैया के कंबल को छुआ, खुशी से साँस ली, और गहरी नींद में सो गया।
उस दिन से छोटा लक्ष्मण कभी राम से अलग नहीं हुआ। जब राम धूप भरे महल में चलता, लक्ष्मण उसकी धोती का पल्लू पकड़कर पीछे-पीछे टहलता। जब राम को लड्डू मिलता, वह उसे दो हिस्सों में बाँटता और बड़ा हिस्सा लक्ष्मण को देता। और राम को तब तक नींद नहीं आती थी, जब तक छोटा भाई पास न हो। भरत और शत्रुघ्न भी ऐसे ही एक-दूजे से प्यार करते थे — चार भाई, दो प्यारी जोड़ियाँ।
रात को, जब सरयू के ऊपर चाँद उगता, तीनों माताएँ चार पालनों के पास हल्की लोरियाँ गातीं, और राजा दशरथ अपने सोते हुए बेटों को देखकर भगवान का धन्यवाद करते — उस इच्छा के लिए जो इतनी सुंदर तरह पूरी हुई थी।
"अच्छी नींद आए, मेरे नन्हे राजकुमार," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने तुम्हें पूरे दिल से माँगा था — और इंतज़ार का हर दिन इसके लायक था।"
रोचक बात: राम एक खास बसंत के दिन पैदा हुए थे, जिसे राम नवमी कहते हैं — और हज़ारों साल बाद भी लोग हर साल उनका जन्मदिन गीतों, मिठाइयों और प्रार्थना से मनाते हैं!
राजा दशरथ ने जल्दबाज़ी नहीं की और शिकायत भी नहीं की — उन्होंने धैर्य और अच्छे मन से इच्छा की, और अपनी खुशी सबके साथ बाँटी। ऐसी इच्छाएँ अपने-आप जादुई हो जाती हैं — वे अपने सही समय पर पूरी होती हैं, और बाँटने से खुशी चार गुना बढ़ जाती है।
कहानी समाप्त
