मुसाफिर फिर अशिगारा आया। उसने योद्धा का चोगा पहना था। उसका नाम उसुई सदामित्सु था और वह मिनामोतो नो योरिमित्सु यानी लॉर्ड राइको के साथ था।
उसे किंतारो नदी के पास मिला। किंतारो गिरे हुए पेड़ के पुल पर बंदर के साथ दौड़ लगा रहा था।
“लॉर्ड राइको को बहादुर जवानों की जरूरत है,” सदामित्सु ने कहा। “क्या तुम राजधानी चलोगे?”
किंतारो की आँखें चमक उठीं, मगर उसकी माँ ने तुरंत जवाब नहीं दिया। पहाड़ ही उसका पूरा घर था।
वे सोच ही रहे थे कि झाड़ियाँ फटने जैसी आवाज के साथ हिलीं। एक डरा हुआ जंगली सूअर रास्ते पर दौड़ता आया। उसके गले में टूटी डाली फँसी थी, इसलिए उसे आगे दिखाई नहीं दे रहा था।
सदामित्सु ने तलवार की ओर हाथ बढ़ाया। किंतारो सीधे सूअर की ओर दौड़ा।
बिलकुल पास पहुँचकर वह एक ओर कूदा और डाली पकड़ ली। सूअर उसे पत्तों और कीचड़ के बीच घसीटता गया। भालू ने किंतारो की लाल पट्टी पकड़ी। बंदर ने भालू की पूँछ। खरहे ने बंदर को पकड़ा—और उसी समय सोचा कि कतार में उसे कोई सुरक्षित जगह चुननी चाहिए थी।
आखिर डाली टूटकर अलग हो गई। सूअर सही-सलामत और बहुत हैरान होकर पेड़ों के बीच भाग गया।
सदामित्सु ने तलवार वापस रखी। “तुममें उसे रोकने की ताकत थी और चोट न पहुँचाने की समझ भी। लॉर्ड राइको तुमसे जरूर मिलना चाहेंगे।”
किंतारो की माँ मुस्कराई। “तो जाओ। देखो दुनिया कितनी बड़ी है।”
पहाड़ के सारे दोस्त उसे नीचे वाले रास्ते तक छोड़ने आए। बंदर ने मेवे बाँधे। हिरन ने छोटा रास्ता दिखाया। खरहे ने लौटते समय पकवान लाने को कहा। भालू ने आखिरी कुश्ती माँगी और विदाई में मिले गले लगने को अपनी जीत बता दिया।
राजधानी में किंतारो ने घुड़सवारी, तलवार चलाना और नक्शे को उलटा किए बिना पढ़ना सीखा। वह लॉर्ड राइको के दूसरे योद्धाओं के साथ अभ्यास करता। पहले वे पहाड़ी बालक की लाल पट्टी देखकर हँसे। फिर किंतारो ने अभ्यास की मोटी लकड़ी उन दोनों के साथ उठा ली, जो उसके ऊपर बैठे थे। उसके बाद कोई नहीं हँसा।
लॉर्ड राइको ने उसे योद्धा का नाम दिया—सकाता नो किंतोकी। किंतोकी उनके भरोसेमंद साथियों में शामिल हुआ, मगर पुराना लाल कपड़ा अपने कवच के भीतर रखता था।
कई साल बाद वह अशिगारा लौटा। पुल पर हरी काई जम गई थी। बंदर के बच्चे डालियों पर खेल रहे थे। पकवानों का नाम लिए बिना ही खरहा भी पहुँच गया।
फिर भालू पेड़ों के बीच से निकला।
“अब ज्यादा ताकतवर हो?” उसने पूछा।
“पता लगाते हैं,” किंतोकी बोला।
दोनों उसी घास पर कुश्ती करने लगे। भालू फिसला। किंतोकी लुढ़का। बंदर के बच्चे ऐसी सलाह चिल्ला रहे थे जिससे किसी को मदद नहीं मिली।
आखिर दोनों साथ-साथ जमीन पर गिरे और आकाश देखकर हँसने लगे।
“मैं जीता,” भालू बोला।
“तुम हमेशा जीतते हो,” योद्धा ने कहा और उसे एक पकवान दे दिया।
