किंतारो: अशिगारा पर्वत का सुनहरा बालक

किंतारो: अशिगारा पर्वत का सुनहरा बालक


किंतारो की असाधारण शक्ति और पहाड़ी जानवरों से मित्रता प्रसिद्ध हो जाती है।

अशिगारा पर्वत पर किंतारो अपनी माँ के साथ झोपड़ी में रहता था। वह सोने के निशान—किन—वाली लाल पट्टी पहनता और छोटी कुल्हाड़ी रखता था।

मगर उसकी ताकत को कोई छोटा नहीं कहता था।

किंतारो वह चट्टान उठा सकता था जिसे तीन लकड़हारे मुश्किल से लुढ़काते। वह पेड़ को इतना झुका देता कि पत्ते जमीन को छूने लगते। उसके पैर पटकने पर सोते खरगोश जाग जाते।

पहाड़ के जानवर उसके सबसे अच्छे दोस्त थे। वह हिरन के साथ ढलान पर दौड़ता, बंदर के साथ पेड़ों पर चढ़ता और नरम घास पर भालू से कुश्ती करता।

“काटना मना है,” किंतारो ने भालू से कहा।

“गुदगुदी करना भी,” भालू बोला।

बंदर मुकाबला सुनाने के लिए ठूँठ पर चढ़ गया। खरहे ने चौड़ा पत्ता झंडे की तरह हिलाया। हिरन ने मिट्टी में शुरू करने की लकीर बनाई।

भालू दौड़ा। किंतारो ने उसे बीच से पकड़ा, एक बार घूमा और जोरदार धप्प के साथ खुद उसके नीचे जा गिरा।

“मैं जीत गया,” किंतारो के ऊपर बैठा भालू बोला।

“मैंने तुम्हें जानबूझकर वहाँ बैठाया है,” नीचे से दबी हुई आवाज आई।

बहस चल ही रही थी कि काले बादल आ गए। तेज बारिश टूट पड़ी। सब छिपने दौड़े, मगर नीचे की धारा झाग वाली नदी बन चुकी थी। पतला पुल बाढ़ में बह गया।

दूसरे किनारे पर हिरनी अपने बच्चे को पुकार रही थी। छोटा बच्चा किंतारो के पास काँप रहा था।

किंतारो ने पहले एक देवदार देखा, फिर दूसरा। उसने वह पेड़ चुना जिसके आसपास कोई घोंसला नहीं था। कुल्हाड़ी के पहले वार से तना आधा कटा। दूसरे वार की आवाज से बंदर के दाँत बज गए। तीसरे पर पेड़ झुकने लगा।

“धक्का लगाओ!” किंतारो चिल्लाया।

भालू ने तने पर कंधा लगाया। हिरन ने सींगों से धक्का दिया। बंदर और खरहा भी लगे रहे—ज्यादातर इसलिए कि बाद में कह सकें, हमने भी धक्का दिया था।

पेड़ नदी के पार जा गिरा।

किंतारो पहले रेंगकर गया और डालियों के बीच बेलें बाँध दीं। भालू पीछे आया और चौड़े पंजों से तना थामे रहा। एक-एक करके सारे जानवर पार हुए। हिरन का छोटा बच्चा सबसे आखिर में किंतारो की बाँह के नीचे छिपकर गया।

उसकी माँ ने चेहरे से बारिश चाट दी।

तूफान जाते ही सब कुश्ती वाले मैदान में लौट आए। भालू बोला कि पुल बनाना दोबारा मुकाबला करने जैसा था। बंदर बोला कि वह दोपहर का खाना खाने जैसा था।

किसी ने पेड़ के पीछे खड़े मुसाफिर को नहीं देखा। वह योद्धा मिनामोतो नो योरिमित्सु की ओर से आया था। उसने ऐसा बालक कभी नहीं देखा था जो भालू से कुश्ती करे और खाने से पहले पुल बना दे।

मुसाफिर पहाड़ से उतर गया। उधर किंतारो और भालू ने नया मुकाबला शुरू कर दिया।

इस बार खरहे ने एक नियम साफ बता दिया—कोई भी रेफरी के ऊपर नहीं गिरेगा।