दिल्ली शहर में सब कुछ सही चल रहा है। सब आराम से सो रहे हैं, उठ रहे हैं, सब मज़े में हैं। बहुत दिनों से कोई गड़बड़ भी नहीं हुई।
पर एक दिन सुबह, जब डॉग्सी और नापू उठते हैं, वो देखते हैं — रोज़ जो चिड़ियाएँ उनके घर के बाहर आती थीं, वो हैं ही नहीं। सारा आसमान खाली है। पूरी दिल्ली में कोई पक्षी की चहचहाहट नहीं। कोई तोता नहीं, कोई कबूतर नहीं, कोई चिड़िया नहीं दिख रही।
डॉग्सी की पसंदीदा गौरैया, मीठू, हर रोज़ ठीक छह बजे उसकी खिड़की पर टक-टक करती है। आज — कुछ नहीं। न टक-टक, न चहचहाहट, न पंखों की फड़फड़ाहट। बस सन्नाटा।
डॉग्सी फटाफट नापू को उठाता है। "नापू, जल्दी इधर आओ!"
नापू पूछता है, "क्या हुआ, क्या हुआ?"
"नापू, यहाँ कोई पक्षी नहीं दिख रहा!"
नापू बाहर देखता है। "अरे हाँ, तुम सही कह रहे हो। सारे पक्षी कहाँ गए?"
दोनों फटाफट अपने दोस्त चूहे को बुलाते हैं — बाइट्स को, जो अपना गोल-गोल चश्मा टेढ़ा किए, आँखें मलते हुए आता है।
"क्या हुआ इतनी सुबह-सुबह?" बाइट्स जम्हाई लेते हुए पूछता है।
"बाइट्स, सारे पक्षी गायब हो गए हैं!"
"सारे? वो चिढ़ाने वाला कौआ भी जो रोज़ मेरे बिल के बाहर चिल्लाकर मुझे उठाता है?"
"वो भी।"
बाइट्स की आँखें अचानक पूरी तरह खुल जाती हैं। "ठीक है, अब मुझे भी फ़िक्र होने लगी। कोई आइडिया है?"
"मुझे नहीं पता," डॉग्सी कहता है। "पर पता लगाते हैं!"
"रुको, रुको," बाइट्स अपनी नन्ही नोटबुक और अपने आधे साइज़ की पेंसिल निकालते हुए कहता है। "अगर हम ये ठीक से कर रहे हैं, तो हमें एक जासूसी नाम चाहिए। मेरा वोट है 'बर्ड स्क्वाड'।"
"अभी इसके लिए टाइम नहीं है—"
"'टीम फ़ेदर फ़ाइंडर'?"
"बाइट्स।"
"ठीक है, ठीक है। चलो चलते हैं।"
तीनों निकल पड़ते हैं। रास्ते में उन्हें कुत्ता शेरू घूमता दिखता है, एक लैम्प-पोस्ट को सूंघते हुए, जैसे कुछ खो गया हो।
"शेरू, कुछ हुआ था क्या? तुमने पक्षी देखे?"
"रात को कुछ अजीब सा म्यूज़िक बज रहा था," शेरू कहता है। "मैंने सुना। उसके बाद, सारे पक्षी उसी म्यूज़िक की तरफ़ जाने लगे। जैसे नींद में चल रहे हों।"
"म्यूज़िक की तरफ़?" नापू सोचता है।
"किस तरफ़ को?" डॉग्सी पूछता है।
"नॉर्थ की तरफ़," शेरू कहता है। "वैसे, किसी के पास बिस्किट है? जासूसी करने से भूख लगती है।"
बाइट्स अपने छोटे थैले से एक बिस्किट उछाल देता है। "ये लो, फ्री में।"
तो वो नॉर्थ की तरफ़ चल देते हैं। थोड़ा आगे उन्हें एक बिल्ली मिलती है, जो एक दीवार पर बड़े शान से बैठी है, जैसे पूरी गली उसी की हो।
"बिल्ली मौसी, कैसी हो?"
"बढ़िया, ज़ाहिर सी बात है। मुझे देखो," बिल्ली अपना पंजा चाटते हुए कहती है। "अब बताओ — कल पक्षी कहाँ गए?"
"वही तो हम पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं!"
"मैंने कनॉट प्लेस के ऊपर एक बहुत बड़ी रोशनी देखी थी," बिल्ली कहती है। "सारे पक्षी उसी तरफ़ जा रहे थे, जैसे कोई उन्हें खींच रहा हो। मैं भी पीछे जाती, पर मैं 'उड़ना' नहीं करती। मेरा स्टाइल नहीं है।"
"अच्छा, तो उस तरफ़ चलते हैं!"
थोड़ा आगे, एक पेड़ पर गिलहरी मिलती है, कुछ चबा रही है जो शायद बिस्किट है, शायद एक छोटा पत्थर है — पक्का कहना मुश्किल है।
"मुझे याद है, पेड़ के पास कुछ गिरा था," गिलहरी कहती है।
"क्या गिरा था?"
"पता नहीं, देख लो! मैं तो खाने में बिज़ी थी।"
बाइट्स फटाफट जाकर देखता है — एक छोटा सा चमकता टुकड़ा पड़ा है। वो अपना नन्हा आवर्धक लेंस निकालता है, पूरे तीन सेकंड तक नाटकीय अंदाज़ में उसे घूरता है, और एलान करता है: "अरे, ये तो किसी ड्रोन का टुकड़ा लग रहा है!"
"ड्रोन?" सब हैरान।
"मुझसे मत पूछो क्यों, ड्रोन से पूछो," बाइट्स कंधे उचकाता है।
आगे बढ़ते हुए उन्हें एक बहुत बूढ़ा कबूतर मिलता है, मरने के कगार पर, सुनाई भी बहुत कम देता है। बाइट्स उसके कान में एक छोटी मशीन लगाता है, दो बार ठीक करता है क्योंकि पहली बार में सिर्फ़ खर-खर की आवाज़ आती है।
"कबूतर दादी, क्या हुआ था?"
"मैं तो बहुत बूढ़ी हूँ, सुनाई ही नहीं देता, मुझे कुछ पता नहीं," वो कहती है। "पर हाँ, ये पता है — एक बड़ी सी, चमकती हुई पक्षी जैसी चीज़ उड़कर जा रही थी, बहुत ऊपर, और सारे पक्षी उसके पीछे भागे जा रहे थे। बेवकूफ़ बच्चे। हमारे ज़माने में हम चमकती चीज़ों के पीछे नहीं भागते थे।"
"शुक्रिया, कबूतर दादी।"
"वैसे, वो कान वाली मशीन मुझे बाद में वापस चाहिए। बड़ी अच्छी है।"
टीम अपनी स्कूटी पर बैठकर नॉर्थ की तरफ़ निकल पड़ती है। थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक क़िला दिखता है। उसकी दीवारें बहुत ऊँची हैं। वो अंदर घुस ही नहीं पा रहे।
"बढ़िया," बाइट्स बुदबुदाता है। "केस बंद। हमने कोशिश तो की। चलो घर चलते हैं।"
"बाइट्स।"
"मैं तो बस बता रहा हूँ, दीवार बहुत ऊँची है।"
तभी नापू के दिमाग़ में तरकीब आती है। नापू सिर्फ़ साँपों से बात नहीं करता — वो पानी के जानवरों से भी बात कर सकता है!
वो क़िले के किनारे आराम से तैर रहे एक कछुए के पास जाकर पूछता है, "कछुए भाई, क्या हमें कोई रास्ता मिल सकता है, इस क़िले के अंदर जाने का?"
"हाँ हाँ," कछुआ बिना आँखें खोले भी कहता है। "पानी के अंदर से एक सुरंग जाती है। अगर उसमें तैरकर जाओ, तो सीधे क़िले के अंदर, एक छोटी सी झील में निकलोगे। सालों से यहाँ हूँ। वैसे किसी ने मुझसे कभी कुछ नहीं पूछा। अच्छा लगा, आज काम आया।"
"वाह, क्या आइडिया दिया!"
"रुको, हम तैरेंगे?" बाइट्स अपने नन्हे पंजों को देखते हुए कहता है। "मैं तो चूहा हूँ। मैं तो पत्थर की तरह डूब जाऊँगा।"
"तुम यहीं रुककर स्कूटी की रखवाली करो," डॉग्सी मुस्कुराता है।
"आख़िरकार एक काम जो मेरे लायक़ है।"
डॉग्सी और नापू फटाफट पानी में घुसते हैं, सुरंग से तैरते हुए महल के अंदर पहुँच जाते हैं, पूरी तरह भीगे हुए और थोड़ा हाँफते हुए।
वहाँ उन्हें दिखता है एक बहुत बड़ा शीशे का कमरा। उसके अंदर बहुत सारे पक्षी बैठे हैं, उदास गाना गा रहे हैं। सामने एक लड़का खड़ा है, हवा में डंडा हिला रहा है, जैसे कोई म्यूज़िक डायरेक्टर हो, जिसका ऑर्केस्ट्रा वहाँ रहना ही नहीं चाहता।
"रुक जाओ!" नापू ज़ोर से चिल्लाता है। "वो रिमोट नीचे रखो!"
लड़का चौंककर घूमता है, रिमोट खड़खड़ाते हुए उसके हाथ से गिर जाता है।
"मैं हूँ डॉग्सी, और ये है नापू। तुम ये सब क्या कर रहे हो?"
"मेरा नाम कवि है," वह रिमोट फिर पकड़ते हुए कहता है। "मैंने दुनिया का सबसे बड़ा पक्षियों वाला ऑर्केस्ट्रा बनाया है। मेरी धुन सुनकर हर पक्षी मेरी बात मानता है। इन्हें कोई नहीं ले जाएगा।"
वह बटन दबाता है। शीशे का दरवाज़ा ठक से बंद हो जाता है और उदास गाना तेज़ हो जाता है।
रिमोट पर ड्रोन जैसा चाँदी का टुकड़ा देखकर नापू बोला, "तुमने इन्हें अपने बस में किया और फिर कैद कर लिया।"
"अब ये मेरे ऑर्केस्ट्रा के पक्षी हैं।"
"ये सिर्फ़ अपने हैं," डॉग्सी ने कहा।
कवि दोबारा वही धुन चलाने के लिए रिमोट उठाता है। डॉग्सी शीशे के पार तेज़ आवाज़ में छोटा-सा हुक्म देता है। सारे कबूतर नीचे बैठ जाते हैं, तोते ऊपर उड़ते हैं और बड़े पक्षी एक साथ पंख फड़फड़ाते हैं। हवा के झटके से पूरा कमरा काँपता है और कवि लड़खड़ा जाता है।
नापू झपटकर रिमोट पकड़ता है और दरवाज़ा खोल देता है।
सारे पक्षी खुशी से आसमान में फैल जाते हैं। कवि पानी वाली सुरंग की ओर भागता है, मगर वहाँ बूढ़ा कछुआ और छह बहुत गंभीर मेंढक रास्ता रोके बैठे हैं। वह पलटता है तो दूसरे दरवाज़े पर डॉग्सी खड़ा है।
बाहर, बाइट्स — जो इस पूरे समय बड़ी गंभीरता से स्कूटी की रखवाली कर रहा था — आसमान पक्षियों से भरता देख लगभग गिर जाता है। "वो आज़ाद हो गए! रुको, क्या ये मैंने किया? मुझे लग रहा है मैंने मदद की।"
डॉग्सी और नापू कवि को पुलिस के हवाले कर देते हैं। पक्षियों को अपने बस में करने और कैद रखने के लिए उसे गिरफ़्तार किया जाता है। पुलिस ड्रोन, रिमोट और उस धुन की हर रिकॉर्डिंग जब्त कर लेती है, ताकि उसका फिर इस्तेमाल न हो सके। कवि ने इसे संगीत कहा था, मगर कैद का नाम बदलने से अपराध नहीं बदलता।
उस शाम, डॉग्सी अपनी बालकनी पर बैठा है, और ठीक समय पर — टक-टक — मीठू खिड़की पर आकर बैठ जाती है, ऐसे चहचहाती है जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"तुम लेट हो," डॉग्सी हँसता है, और मीठू और ज़ोर से चहचहाने लगती है, जैसे वो ख़ुद पूरी कहानी सुना रही हो।
और उस शाम, दिल्ली का आसमान फिर से चिड़ियों की चहचहाहट से भर जाता है — साथ में एक बहुत घमंडी चूहा, जो सबको बता रहा है कि उसने "स्कूटी की रखवाली बिल्कुल हीरो की तरह की।"
