चीं-चीं को तालाब के पास एक बटन मिला। वह गोल, नीला और इतना चमकीला था कि उसमें आसमान का छोटा टुकड़ा दिखाई देता था।
“खज़ाना!” वह चिल्लाई।
पिप बत्तख दौड़कर आया। “मैं पकड़ूँ?”
चीं-चीं ने बटन पंख के नीचे छिपा लिया। “तुम गिरा दोगे।”
“मैं घास पर खड़ा हूँ।”
“घास भी गिरा सकते हो।”
तीन दिन तक चीं-चीं बटन साथ लेकर घूमी। नाश्ते पर उसे चमकाती, सिर पर रखती और रात को पत्ते के नीचे छिपाती। पिप पास आता तो वह दोनों पंखों से बटन ढक लेती।
चौथे दिन पिप आया ही नहीं।
चीं-चीं ने अकेले छिपाने-खोजने का खेल खेला। बटन पत्थर के नीचे रखा, दस तक गिना और तुरंत खोज लिया। हर बार जीतने में जरा भी मज़ा नहीं था।
तालाब पर वह पानी में बटन की परछाईं देखने झुकी।
प्लिप!
बटन चोंच से छूटा, एक बार चमका और गहरे पानी में गायब हो गया।
चीं-चीं ने सिर डुबोया। बाहर आई तो सिर पर काई थी। दोबारा गई और पुराना बलूत का कटोरा निकाल लाई।
“मेरा खज़ाना!” वह रोई।
सरकंडों के पीछे पिप ने आवाज सुनी। वह अभी नाराज़ था, फिर भी पास आ गया।
“चपटे पत्थर के पास गिरा,” चीं-चीं बोली। “मैं नीचे नहीं पहुँच पा रही।”
पिप ने साँस भरी और गोता लगाया। उसकी पूँछ भी गायब हो गई। बुलबुले उठे। फिर वह सिर पर घोंघा रखकर निकला।
“गलत गोल चीज़,” उसने कहा।
दूसरी बार नीला कंकड़ मिला। तीसरी बार उसकी चोंच में बटन था।
चीं-चीं ने खज़ाना पकड़ा, फिर पिप को जाते देखा।
“रुको।” उसने बटन पिप के गीले सिर पर रख दिया। “तुमने खोजा है। पहली बारी तुम्हारी।”
पिप ने सिर टेढ़ा किया। बटन उसकी चोंच पर फिसला और नीले सिक्के की तरह जीभ पर जा बैठा। दोनों हँस पड़े।
उस दिन बटन कभी समुद्री खज़ाना बना, कभी भृंग की थाली और कभी अखरोट की गाड़ी का पहिया। गाड़ी तालाब में गई तो पिप ने चीं-चीं के चीखने से पहले निकाल ली।
शाम को उन्होंने सरकंडों के पास छोटा डिब्बा बनाया। बटन वहीं रहता और दोनों उसे ले सकते थे।
सुबह पिप डिब्बे के पास खड़ा मिला।
“खज़ाना खोजें?” उसने पूछा।
चीं-चीं ने बटन उसे दिया। “तुम छिपाओ। बस घास मत छिपाना।”
