चीं-चीं सबसे ऊँचे सेमल के पेड़ पर रहती थी। उसके पंख इतने सफेद थे कि नींद में उड़ती तितलियाँ उसे बादल समझकर बैठ जातीं।
उड़ान के पहले दिन मम्मी ने पूँछ खोलना सिखाया। पापा ने हवा की ओर झुकना बताया।
चीं-चीं ने दोनों को झाड़ी में गिरना दिखाया।
शाम तक वह पेड़ का चक्कर लगाकर उतर सकती थी। अब पापा का सिर गद्दे की तरह इस्तेमाल नहीं करना पड़ता था।
मम्मी ने कहा, “आसमान बहुत बड़ा है। रास्ते पहचानने तक हमारे साथ उड़ना।”
सुबह चीं-चीं सबसे पहले जागी। घाटी के ऊपर चमकीला इंद्रधनुष था। उसका एक सिरा पहाड़ी के पीछे छिपा था।
“बस देखकर लौट आऊँगी,” वह फुसफुसाई।
वह तालाब और टुकु कछुए की चट्टान के ऊपर से उड़ती हुई लाल रंग में घुस गई। रंग गुलाल की तरह उड़ा। चीं-चीं नारंगी में लोटी, हरे पर फिसली और नीले में तीन बार छींकी।
बाहर निकली तो हर पंख का रंग अलग था।
तभी इंद्रधनुष गायब हो गया।
चीं-चीं घर की ओर मुड़ी, मगर सारी पहाड़ियाँ एक जैसी लगीं। वह गलत नदी के पीछे गई, दीमक की बाँबी के दो चक्कर लगाए और एक काली चट्टान पर उतरने लगी।
चट्टान ने आँख खोली। वह भैंसा था।
काफी देर बाद उसे सेमल का पेड़ दिखा। वह थकी हुई डाल पर उतरी।
मम्मी पीछे हट गईं। “तुम कौन हो?”
“मैं चीं-चीं हूँ!”
पापा ने उसकी बैंगनी पूँछ और नारंगी चेहरा देखा। “हमारी चीं-चीं तो सफेद है।”
“मुझे मसला अंजीर पसंद नहीं, मैं एक पैर घोंसले से बाहर रखकर सोती हूँ, और पापा मटके में बैठे मेंढक जैसे खर्राटे लेते हैं!”
पापा ने गर्दन सीधी की। “बातें तो चीं-चीं वाली हैं।”
नीचे से टुकु बोला, “वह तीन छींक मैं कहीं भी पहचान लूँगा।”
रंग पोंछने से नहीं निकले। टुकु सबको पहाड़ी से लगी छोटी बारिश वाली बदली तक ले गया। चीं-चीं उसके अंदर उड़ गई। ठंडी बूँदें पंखों पर ढम-ढम गिरीं। लाल बहा, फिर नारंगी, हरा और नीला।
वह दूसरी ओर से सफेद होकर निकली और हँसने लगी।
घर लौटते समय मम्मी एक तरफ उड़ीं, पापा दूसरी तरफ। रास्ता चीं-चीं ने दिखाया—भैंसे के पास से, तालाब के ऊपर और बाँबी के आगे से।
शाम को इंद्रधनुष फिर निकला। चीं-चीं घोंसले से झुकी।
“अब चलें?” उसने पूछा।
मम्मी ने पंख खोले। पापा जम्हाई लेकर पीछे आए। तीनों रंगों की ओर उड़ चले। नीचे से टुकु चिल्लाया, “मेरे खोल के लिए थोड़ा बैंगनी लाना!”
