एलिस नदी किनारे बहन के पास बैठी थी। वह इतनी ऊब गई कि फूलों की माला बनाने के लिए उठना भी बहुत बड़ा काम लग रहा था। तभी गुलाबी आँखों वाला सफ़ेद खरगोश तेज़ी से निकला।
“अरे बाप रे! मुझे देर हो जाएगी!” उसने कोट की जेब से घड़ी निकालकर कहा।
बोलता खरगोश अजीब था। कोट और घड़ी वाला खरगोश तो पीछे दौड़ने लायक था।
एलिस मैदान पार करके बड़े खरगोश-बिल में उसके पीछे कूद गई। रास्ता कुएँ जैसा नीचे गया। वह धीरे-धीरे अलमारियों, नक्शों और तख्तों के पास से गिरी। एक तख्ते से उसने “संतरे का मुरब्बा” वाली शीशी उठाई, मगर वह खाली थी। गिरते-गिरते उसने उसे दूसरी जगह ठीक से रख दिया। इतनी अजीब हालत में भी तहज़ीब नहीं भूली।
वह सूखे पत्तों पर उतरी। खरगोश मोड़ के पीछे गायब हो गया।
आगे बहुत सारे बंद दरवाज़ों वाला कमरा था। बीच में काँच की मेज़ पर सोने की छोटी चाबी रखी थी। वह चूहे जितने ऊँचे दरवाज़े में लगी। दूसरी ओर सबसे सुंदर बाग था—रंगीन फूल, ठंडे फव्वारे और ऐसे रास्ते जहाँ लंबा गिरना नहीं पड़ता था।
मगर एलिस अंदर जाने के लिए बहुत बड़ी थी।
मेज़ पर “मुझे पियो” वाली बोतल आई। एलिस ने पहले देखा कि ज़हर तो नहीं लिखा। थोड़ा पीते ही वह दस इंच की हो गई।
अब दरवाज़ा ठीक था—मगर चाबी ऊँची मेज़ पर छूट गई।
नीचे “मुझे खाओ” वाला केक मिला। एक कौर खाते ही वह दूरबीन जैसी लंबी हो गई। सिर छत से लग गया।
“यह तो और भी अजीब है!” वह बोली।
सफ़ेद खरगोश सफ़ेद दस्ताने और पंखा लेकर लौटा। बड़ी एलिस को देखकर सब गिराया और भाग गया।
एलिस ने पंखा उठाया। यह सोचते-सोचते कि अब वह कौन है, वह फिर छोटी होने लगी। वह छोटे दरवाज़े की ओर भागी, मगर फिसलकर नमकीन पानी में जा गिरी।
तभी समझ आया—वह अपने ही आँसुओं से बने बड़े तालाब में तैर रही थी।
