ज़ारा को सफेद नूडल्स बहुत पसंद थे। सीधे नूडल्स, घुँघराले नूडल्स, गरम नूडल्स, ठंडे नूडल्स—बस नूडल्स होने चाहिए। प्लेट में मटर आता तो वह उसे चम्मच के नीचे छिपा देती। गाजर आती तो उसके चारों ओर नूडल्स की दीवार बना देती।
एक दोपहर ज़ारा फर्श पर सूरज वाली पहेली जोड़ रही थी। पीला टुकड़ा उसकी उँगलियों से छूट गया।
“मेरी बाँहें ढीली पड़ गई हैं,” उसने कहा।
मम्मी ने माथा छुआ। बुखार नहीं था, फिर भी ज़ारा थकी लग रही थी। दोनों डॉ. जोजो के क्लिनिक पहुँचीं।
दरवाज़े पर बड़ी-सी मुस्कान बनी थी। अंदर खिलौने वाला ढाँचा बैंगनी मोज़े पहने खड़ा था। डॉ. जोजो दौड़कर आए तो उनका स्टेथोस्कोप छन-छन बजा।
उन्होंने ज़ारा की धड़कन सुनी, आँखें देखीं और पूछा, “आज क्या खाया?”
“नूडल्स।”
“कल?”
“नूडल्स।”
“सब्ज़ियाँ?”
ज़ारा फुसफुसाई, “गायब हो गईं।”
डॉ. जोजो ने आँखें बड़ी कीं। “सब्ज़ियों का रहस्य! रेनबो व्यूअर लाना पड़ेगा।”
उन्होंने रंगीन बटनों वाला गोल आईना निकाला। ज़ारा ने उसमें झाँका तो एक नन्ही रसोई दिखी। उसकी मांसपेशियों के छोटे कामगार खाली अलमारियाँ टटोल रहे थे।
“फिर नूडल्स!” एक ने जम्हाई ली। “कुरकुरे रंग कहाँ हैं?”
डॉ. जोजो ने बताया कि नूडल्स शरीर को ताकत देते हैं, मगर खेलने, बढ़ने और ठीक रहने के लिए अलग-अलग खाना भी चाहिए।
“मैं पूरी गाजर नहीं खा सकती,” ज़ारा बोली।
“पहली बार के लिए पूरी गाजर बहुत बड़ी होगी,” डॉ. जोजो हँसे।
उन्होंने उसे कागज़ का जासूसी बैज दिया। “इस हफ्ते तीन रंग खोजो। बस एक छोटा टुकड़ा चखना है। पसंद न आए तो साफ बता देना। जासूस सच्ची रिपोर्ट देते हैं।”
शाम को ज़ारा ने गाजर का गोल टुकड़ा चखा। चर्र! बहुत आवाज आई।
“सबसे पसंदीदा नहीं,” उसने कहा, “पर इसे खाना मज़ेदार है।”
अगले दिन हरी मटर दो बार काँटे से भागी, फिर उसके मुँह में पहुँची। तीसरे दिन उसने लाल शिमला मिर्च दही में डुबोई।
“यह जीत गई!” ज़ारा बोली।
अब उसकी प्लेट में नूडल्स के साथ दो जाने-पहचाने रंग और एक नया स्वाद रहता। कुछ चीज़ें उसे पसंद आईं, कुछ नहीं। किसी को चम्मच के नीचे छिपना नहीं पड़ा।
हफ्ते के आखिर में ज़ारा ने सूरज वाली पहेली पूरी की और उसके पास नूडल्स जैसा रॉकेट बनाने की ताकत भी बची।
मम्मी को पुरानी चप्पल के अंदर गायब मटर मिल गए।
ज़ारा ने जासूसी बैज लगाया। “रहस्य सुलझ गया!”
