प्रिया के टूथब्रश पर पीली बत्तख बनी थी। उसे बत्तख पसंद थी। स्ट्रॉबेरी वाला पेस्ट भी पसंद था। बस ब्रश के बाल दाँतों से लगते ही वह भाग जाती।
“बहुत गुदगुदी!” वह हर रात कहती। पीछे वाले दाँत साफ होने से पहले ही उसका मुँह बंद हो जाता।
कुछ दिनों बाद दाँत ऐसे लगे जैसे उन्होंने रोएँदार स्वेटर पहन लिए हों। सुबह टोस्ट काटते समय पीछे के एक दाँत में हल्का दर्द हुआ।
डॉ. जोजो के क्लिनिक में प्रिया खास कुर्सी पर बैठी और उसने मुँह खोला।
“आऽऽ,” वह बोली।
“बहुत बढ़िया गुफा,” डॉ. जोजो ने कहा। “देखें, अंदर कौन रहने आया है।”
उन्होंने तेज रोशनी की और प्रिया के हाथ में छोटा आईना दिया। एक दाँत के पास चिपचिपे टुकड़े फँसे थे। नीचे हल्का-सा सफेद निशान दिख रहा था।
डॉ. जोजो ने अपना स्पार्कल-स्पाई टैबलेट खोला। स्क्रीन पर टुकड़े हरे शुगर-बग बन गए। एक ने रोटी का टुकड़ा टोपी की तरह पहना था। दूसरा बिस्कुट का किला बना रहा था।
“ये दाँतों पर बचा खाना खाते हैं,” डॉक्टर ने बताया। “बहुत देर रहें तो दर्द वाला छेद बना सकते हैं।”
प्रिया ने भौंहें चढ़ाईं। “वह मेरा दाँत है। वहाँ इनका किला नहीं बनेगा।”
“तो इन्हें आराम से बाहर निकालते हैं।”
डॉ. जोजो ने बहुत नरम ब्रश दिया। पहले प्रिया ने उसे उँगली से छुआ। फिर ब्रश ने सामने के एक दाँत को छुआ।
गुदगुदी!
प्रिया हँसी, मगर भागी नहीं।
“ब्रश को रास्ता याद कराते हैं,” डॉक्टर बोले। “बाहर, अंदर, चबाने वाली जगह। धीरे-धीरे गोल घुमाओ।”
प्रिया ने मज़ेदार धुन चुनी। डॉ. जोजो गुनगुनाते रहे और उसने ऊपर के दाँत साफ किए, फिर नीचे के। गुदगुदी बढ़ती तो वह रुककर साँस लेती और दोबारा शुरू करती।
स्क्रीन पर शुगर-बग भागने लगे। रोटी की टोपी वाला झाग की लहर में पलट गया।
“भागो!” प्रिया बुलबुलों के बीच बोली।
उस रात उसने मम्मी को पूरा रास्ता दिखाया। बाहर, अंदर, चबाने वाली जगह। पीली बत्तख ऊपर-नीचे होती रही। पीछे के दाँत पर प्रिया ने धीरे से छोटे गोले बनाए।
ब्रश के बाद उसके दाँत रोएँदार नहीं, चिकने लगे। सुबह न स्वेटर था, न बिस्कुट का किला।
उसने बत्तख वाला ब्रश झंडे की तरह उठाया। “इस गुफा में सिर्फ मैं रहती हूँ!”
