फ़ारस के एक नगर में दो भाई रहते थे। कासिम ने अमीर व्यापारी की बेटी से शादी की और बड़ी दुकान चलाता था। अली बाबा लकड़ी काटकर तीन गधों पर घर लाता और उसी से रोटी कमाता।
एक दिन जंगल में घोड़ों की आवाज़ आई। हथियार वाले चालीस सवार धूल उड़ाते आए। अली बाबा पेड़ पर छिप गया। वे सीधी चट्टान के सामने रुके।
सरदार ने कहा, “खुल जा, सिमसिम!”
पत्थर में दरवाज़ा खुला। आदमी भारी थैले भीतर ले गए। बाहर आकर सरदार बोला, “बंद हो, सिमसिम!” चट्टान बंद हुई और सवार पेड़ों के बीच चले गए।
अली बाबा धूल बैठने तक रुका, फिर नीचे आया।
“खुल जा, सिमसिम!”
अंदर गलीचे, रेशम, मसाले, चाँदी और कई साल की चोरी वाला सोना था। उसने सिक्कों का एक छोटा बोरा लिया, गधों पर लकड़ी के नीचे छिपाया और गुफा बंद कर दी।
घर में पत्नी सोना गिनना चाहती थी। सिक्के बहुत थे, इसलिए उसने कासिम की पत्नी से नापने वाला बर्तन माँगा। शक के कारण उसने नीचे चिकनाई लगा दी।
बर्तन लौटने पर एक सोने का सिक्का तले से चिपका था।
“अली बाबा सोना नापता है और हम अपना गिनते हैं?” वह बोली।
कासिम ने भाई से राज़ माँगा। अली बाबा ने मुश्किल से शब्द और रास्ता बता दिया।
सुबह से पहले कासिम दस खच्चर लेकर जंगल गया। “खुल जा, सिमसिम!” कहकर खाली संदूक भीतर ले गया।
लालच में हर खज़ाना उसे कम लगा। सोना, रत्न और कपड़े बोरे में भरता गया। दरवाज़े तक आते-आते दिमाग में केवल दौलत थी।
“खुल जा, जौ!” वह चिल्लाया।
कुछ नहीं हुआ।
“खुल जा, गेहूँ! खुल जा, बाजरा! बाज़ार का हर अनाज, खुल जा!”
चट्टान नहीं हिली। घबराकर कासिम वह छोटा शब्द भूल चुका था, जिसकी ज़रूरत थी।
बाहर घोड़ों की आवाज़ से धरती हिली। चालीस चोर लौट रहे थे और सरदार गुफा के पास खड़े दस अनजान खच्चर देख चुका था।
